बात 1930 की है। देश की आजादी की लड़ाई चल रही थी। क्रांति के दीवाने हंसते-हंसते मौत को गले लगा रहे थे। उस जमाने में रामाधीन निगम उत्तर प्रदेश में (रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया) के संचालक थे और चरखारी नरेश के आग्रह पर रामाधीन निगम ने लखनऊ शहर में बम बनाने वाले वाला कारखाना स्थापित किया।
एक हुसैनाबाद और दूसरा कश्मीरी मोहल्ले में। दोनों मकान किराए पर थे और मुस्लिम बस्तियों के ठीक बीचों-बीच। इन मकानों में दल के सदस्य मुस्लिम वेशभूषा में रहने लगे। बम बनाने की समस्त सामग्री, कारतूस, रिवॉल्वर, पिस्तौल, साइक्लोस्टाइल मशीन सभी कुछ था।
उस जमाने में संयुक्त प्रांत गुप्तचर विभाग का प्रधान कार्यालय इलाहाबाद था और लखनऊ में ग्रुप अफसर की हैसियत से तैनात थे सीआईडी इंस्पेक्टर अहमद हुसैन खां। ‘क्रांति आंदोलन: कुछ अधखुले पन्ने’ किताब के प्रसंग से पता चलता है, ‘क्रांतिकारियों के लिए जिस मकान में बम बनते थे उसके बगल में हुसैन के ससुर रहा करते थे। नाम था उनका मुर्तजा हुसैन।