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UP Politics: बसपा की सियासी नर्सरी से छिटक रहे कई ब्राह्मण नेता, अब सतीश मिश्रा पर सारा दारोमदार

Fri, 14 Aug 2026 09:11 AM IST
Ishwar Ashish Bhartiya अशोक मिश्रा, अमर उजाला, लखनऊ

सार

2007 के यूपी विधानसभा चुनाव में 80 ब्राह्मणों को टिकट देकर 41 को जिताने वाली बसपा अब बिखराव से जूझ रही है। वहीं, पार्टी की तैयारी फिर से ब्राह्मणों को साधने की है जिसका सारा दारोमदार अब सतीश मिश्रा पर है।
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बसपा सुप्रीमो मायावती। - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री मायावती आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी का वजूद बचाने के लिए एक बार फिर ब्राह्मणों पर दांव लगाने की तैयारी में हैं। हालांकि, पार्टी के कई कद्दावर ब्राह्मण नेता लगातार उनका साथ छोड़ते गए हैं। अंटू मिश्रा का निष्कासन इसकी ताजा कड़ी है। बीते एक दशक में कई ऐसे नेता बसपा से दूर हुए, जिन्होंने अपनी राजनीति का ककहरा हाथी पर सवार होकर सीखा था। यह कहना गलत न होगा कि बसपा की सियासी नर्सरी कद्दावर ब्राह्मण नेताओं से खाली होती जा रही है।
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वर्ष 2007 में बसपा ने 80 से अधिक ब्राह्मणों को टिकट देकर चुनावी मैदान में उतारा था। इनमें 41 जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। पार्टी की यह सोशल इंजीनियरिंग इतनी सफल रही कि दूसरे दलों ने भी इसका अनुसरण किया। मगर वर्ष 2017 का विधानसभा चुनाव आते-आते ब्राह्मण नेताओं का पार्टी से मोहभंग शुरू हो गया। मौजूदा भाजपा सरकार के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक इसका प्रमुख उदाहरण हैं। बसपा ने उन्हें सांसद बनाया था लेकिन चुनाव से पहले उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया। बाद में यह फैसला उनके राजनीतिक भविष्य के लिए मुफीद साबित हुआ।

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पूर्व मंत्री नकुल दुबे ने 2022 में बसपा छोड़कर कांग्रेस का रुख किया। पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय (अब दिवंगत), रंगनाथ मिश्रा तथा विनय शंकर तिवारी और उनका पूरा कुनबा भी बसपा से दूर हो गया। पूर्व विधान परिषद सभापति गणेश शंकर पांडेय समेत सरकार में उच्च पद पाने वाले कई अन्य ब्राह्मण नेता भी समय के साथ दूसरे दलों में चले गए। 

अंबेडकरनगर से बसपा सांसद व विधायक रहे राकेश पांडेय और उनके बेटे व बसपा सांसद रहे रितेश पांडेय भी पार्टी का साथ छोड़ चुके हैं।
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बिकरू कांड की आरोपी खुशी दुबे की मदद की थी

अंटू मिश्रा समेत कई प्रमुख ब्राह्मण नेताओं के अलग होने से बसपा की इस समुदाय को जोड़ने की मुहिम को झटका लगा है। अब इसकी पूरी जिम्मेदारी राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा के कंधों पर है। संगठन में वही प्रमुख ब्राह्मण चेहरा रह गए हैं। वह लंबे समय से ब्राह्मण सम्मेलनों की अगुवाई करते रहे हैं। उनके बेटे कपिल मिश्रा और अन्य परिजन भी इन अभियानों में सहयोग करते रहे हैं। वर्ष 2007 से पहले सतीश चंद्र मिश्रा के कई परिजन भी बसपा में शामिल हुए थे।

ब्राह्मणों का समर्थन हासिल करने के लिए बसपा ने बिकरू कांड की आरोपी खुशी दुबे का मुकदमा लड़ने की कवायद की थी। वर्ष 2021 में पार्टी ने ब्राह्मण सम्मेलन भी किया। मायावती समय-समय पर भाजपा सरकार पर ब्राह्मणों की उपेक्षा का आरोप लगाती रही हैं। आगामी विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी ने पहला प्रत्याशी भी ब्राह्मण बनाया और इसके बाद सादाबाद सीट से भी ब्राह्मण उम्मीदवार घोषित किया। इसके बावजूद दूसरे दलों के बड़े ब्राह्मण नेता बसपा में आने से कतरा रहे हैं।

भाजपा दफ्तर जाने पर मचा था हंगामा
अंटू मिश्रा दो वर्ष पूर्व अचानक भाजपा प्रदेश कार्यालय आए थे, जिसके बाद हड़कंप मच गया था। वह मार्च, 2024 में भाजपा की सदस्यता ग्रहण करने वाले बसपा के एक नेता के साथ पहुंचे थे, हालांकि उनको सदस्यता ग्रहण नहीं कराई गई थी। उस दौरान भाजपा नेताओं ने अंटू मिश्रा को दिल्ली में सदस्यता ग्रहण कराए जाने का बयान दिया था। हालांकि उन्हें भाजपा में शामिल करने का फैसला नहीं हो सका।
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