अंटू मिश्रा समेत कई प्रमुख ब्राह्मण नेताओं के अलग होने से बसपा की इस समुदाय को जोड़ने की मुहिम को झटका लगा है। अब इसकी पूरी जिम्मेदारी राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा के कंधों पर है। संगठन में वही प्रमुख ब्राह्मण चेहरा रह गए हैं। वह लंबे समय से ब्राह्मण सम्मेलनों की अगुवाई करते रहे हैं। उनके बेटे कपिल मिश्रा और अन्य परिजन भी इन अभियानों में सहयोग करते रहे हैं। वर्ष 2007 से पहले सतीश चंद्र मिश्रा के कई परिजन भी बसपा में शामिल हुए थे।
ब्राह्मणों का समर्थन हासिल करने के लिए बसपा ने बिकरू कांड की आरोपी खुशी दुबे का मुकदमा लड़ने की कवायद की थी। वर्ष 2021 में पार्टी ने ब्राह्मण सम्मेलन भी किया। मायावती समय-समय पर भाजपा सरकार पर ब्राह्मणों की उपेक्षा का आरोप लगाती रही हैं। आगामी विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी ने पहला प्रत्याशी भी ब्राह्मण बनाया और इसके बाद सादाबाद सीट से भी ब्राह्मण उम्मीदवार घोषित किया। इसके बावजूद दूसरे दलों के बड़े ब्राह्मण नेता बसपा में आने से कतरा रहे हैं।
भाजपा दफ्तर जाने पर मचा था हंगामा
अंटू मिश्रा दो वर्ष पूर्व अचानक भाजपा प्रदेश कार्यालय आए थे, जिसके बाद हड़कंप मच गया था। वह मार्च, 2024 में भाजपा की सदस्यता ग्रहण करने वाले बसपा के एक नेता के साथ पहुंचे थे, हालांकि उनको सदस्यता ग्रहण नहीं कराई गई थी। उस दौरान भाजपा नेताओं ने अंटू मिश्रा को दिल्ली में सदस्यता ग्रहण कराए जाने का बयान दिया था। हालांकि उन्हें भाजपा में शामिल करने का फैसला नहीं हो सका।