‘मीत ने मीत को गीत दिए हैं, ये शब्दों का चयन नहीं है। हम सभी को बतला भी देते, दिखला भी देते। वैसे नयन नहीं हैं।’
यह केवल शब्द नहीं, एक कवि के फकीरी और अल्हड़पन को रूबरू करातीं एक कविता की चंद पंक्तियां हैं।
इसी जिंदगी की फकीरी ने पेशे से मनोचिकित्सक डॉ. राज कुमार को कवि बना दिया। जब यह फकीरी जब कविताओं में उतरी तो दिल का दर्ज अल्फाज़ की शक्ल में सामने आ गया।
रविवार को लखनऊ एक्सप्रेशंस के ‘हम गीत सुनाने आए’ कार्यक्रम में डॉ. राज कुमार ने अपनी कविताएं सुनाईं। यह कार्यक्रम कैंटोनमेंट स्थित एमबी क्लब में आयोजित किया था।
एक के बाद एक गीत-कविताओं ने समां बांधा। कभी आंखों से आंसू तो कभी होठों पर थिरकन ने दिल के दर्द को भी सामने ला दिया।
कविताएं खत्म हुईं तो कवि ने अपना दर्द भी बयां कर ही दिया। डॉक्टर था तो लोगों का दर्द खुद के जेहन और दिल में समां लेता था।
इसी दर्द को बाहर निकालने का सहारा कविताएं बनीं। यही वजह रही कि एक मनोचिकित्सक कवि बन गया।