हाथ, पैर और कूल्हे की हड्डी टूट जाए तो उसे जोड़ने के लिए प्लास्टर चढ़ाने की जरूरत बहुत कम होगी। केजीएमयू में अब नई तकनीकी से एक ऐसा उपकरण बनाया गया है, जिसे मरीज को लगा दिया जाए तो मरीज को प्लास्टर के झंझट से छुटकारा मिल जाएगा। केजीएमयू में नई तकनीक से इलाज शुरू भी किया जा चुका है।
प्लास्टर की तुलना में बेहतर नतीजेः आर्थोपेडिक विभाग के प्रमुख डॉ जीके सिंह ने बताया कि इस तकनीकी से उपकरण बनाने में करीब दो माह लगता था, मगर अब यह महज मरीज की नाप लेकर दस मिनट में कार्यशाला में तैयार कराया जा रहा है। इसके निर्माण में आने वाला खर्च भी मामूली होता है। उनका कहना है कि प्लास्टर चढ़ाने पर मरीज को दो माह बाद उतरता था। मगर इसे लगाने पर महज चार हफ्ते में कवर कर लेताा है।
ऑर्थोपैडिक विभाग के प्रमुख डॉ. जीके सिंह ने बताया कि श्वेता भटनागर (35) का 24 अक्तूबर को कार एक्सीडेंट में हाथ में चोट लगने कंधे के नीचे की हड्डी टूट गई थी। बरेली में हुए हादसे के कारण डॉक्टरों ने हड्डी को जोड़ने के लिए सर्जरी का परामर्श दिया था। इसके बाद महिला मरीज डॉ. जीके सिंह को हाथ दिखाने पहुंची।
पांच हजार रुपये आया खर्च
उपकरण बनाते हुए
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यहां पर डॉ. सिंह ने फौरी तौर पर प्लास्टर बांध दिया। तीन हफ्ते बाद प्लास्टर खोलने पर हड्डी काफी हद तक जुड़ गई थी, लेकिन कमजोर लग रही थी। इसके बाद उन्होंने एक र्नई तकनीक से उपकरण बनाने का निर्णय लिया। इसके लिए कृत्रिम अंग कार्यशाला के प्रबंधक अरविंद निगम, सीनियर प्रोस्थोडॉन्टिस्ट शगुन के अलावा अंग निर्माण में मदद करने वाली इंडोलाइट के रीजनल मैनेजमेंट वीरेंद्र प्रसाद के सहयोग से उपकरण बनाने का निर्णय लिया।
इस उपकरण का प्रयोग बहुत ही कम निजी अस्पतालों में प्रयोग किया जाता है। सरकारी स्तर पर अभी तक इस उपकरण का प्रयोग नहीं हुआ है। ह्यूमरल फ्रैक्चर बेस मोड लो टम्प्रेचर थर्मोप्लास्टिक उपकरण को बनाने के लिए सीधे तौर पर हाथ का नाप लेकर थर्मो प्लास्टिक को शगुन के सहयोग से सीधे मशीन में मोल्ड कर दिया।
डॉ. सिंह के दिशा निर्देशन में बने इस उपकरण को बनाने में मात्र दस मिनट लगे और लगभग पांच हजार का खर्च आया। अरविंद निगम ने बताया कि इस उपकरण के बन जाने पर कूल्हे की हड्डी, पैर की हड्डी पर प्लास्टर नहीं चढ़ाना होगा। सीधे इस उपकरण को लगाया जाएगा। उन्होंने बताया कि स्पाइन को सीधा करने में भी इसका प्रयोग किया जाएगा।
डॉ. जीके सिंह ने बताया कि हड्डियों को जोड़ने के लिए यह उपकरण काफी कारगर है। मगर महंगा होने के चलते मरीज इससे वंचित रहते थे। उनका कहना है सरकारी अस्पताल में इसका खर्च मामूली आता है, जबकि निजी संस्थानों में यह दो से तीन गुना महंगा पड़ता है।