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छोटे चीरे से होगा बच्चों के कूल्हे में बोन मैरो का प्रत्यारोपण, केजीएमयू के डॉक्टर ने खोजी तकनीक

Sun, 15 Sep 2019 11:41 AM IST
लखनऊ ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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बच्चों के कूल्हे में बोन मैरो प्रत्यारोपण अब आसान हो जाएगा। बड़े चीरे की जरूरत नहीं पड़ेगी और लोकेशन भी नहीं बदलना पड़ेगा। इससे घाव जल्दी भरेगा। इस तकनीक को विकसित किया है केजीएमयू के पीडियाट्रिक ऑर्थोपेडिक्स विभागाध्यक्ष प्रो. अजय कुमार सिंह ने। उन्होंने इसके पेटेंट के लिए आवेदन किया है।

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प्रो. अजय सिंह ने बताया कि चार से आठ साल की उम्र वाले कुछ बच्चों में कूल्हे की हड्डी में खून का दौरा कम हो जाता है। इससे उनकी उम्र आठ से 10 साल की होने के बाद अर्थराइटिस हो जाता है। यह समस्या करीब एक हजार बच्चे में किसी एक को होती है। अब तक इंजेक्शन और कुछ दवाओं के जरिये इसे ठीक किया जाता था, लेकिन उसकी सफलता की दर 10 से 15 फीसदी है। इसके बाद बोन मैरो प्रत्यारोपण की तकनीक शुरू हुई। ज्यादातर पीडियाट्रिक ऑर्थोपेडिक्स सर्जन कूल्हे के ऊपर 10 से 15 सेमी. का चीरा लगाते हैं। फिर हड्डी की गोलाई वाले हिस्से को बाहर निकालते हैं।

इसके बाद उसमें स्टेम सेल भरते हैं। इस दौरान कई तरह के जोखिम होते हैं। कूल्हे को बाहर निकालने में कुछ नसों के कटने की आशंका रहती है। चीरा लंबा होने से घाव भरने में वक्त लगता है। प्रो. अजय सिंह के मुताबिक उन्होंने इसमें नया प्रयोग किया। चीरा सिर्फ तीन सेमी का लगाया और कूल्हे के गोलाई वाले हिस्से को बाहर निकालने के बजाय उसमें चार सेमी का अलग रास्ता बनाया और फिर सी आर्म्स मशीन के जरिये इसी रास्ते से स्टेम सेल को भरा। यह प्रयोग पूरी तरह से सफल रहा। सौ से ज्यादा मरीजों में यह प्रयोग सफल होने के बाद पेटेंट के लिए आवेदन किया है।

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नई तकनीक में नसों को नुकसान न के बराबर

प्रो. अजय ने बताया कि नई तकनीक में चीरा छोटा लगता है। नसों के कटने का खतरा न के बराबर होता है। चार सेमी. के रास्ते से स्टेम सेल को प्रवेश कराने के बाद एबी जेल के जरिये ऊपर पैकिंग कर दी जाती है। इससे स्टेम सेल के बाहर निकलने का खतरा नहीं रहता है। इसमें बच्चे के शरीर से करीब 20 एमएल बोन मैरो लिया जाता है और उसे सेंटीफ्यूजन से छह एमएल का बना लिया जाता है। फिर उसे प्रत्यारोपित किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में करीब 20 मिनट लगता है।
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