लखनऊ। किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) के डॉक्टरों ने कैथेटर आधारित नई तकनीक से रोगी के फेफड़े की मुख्य धमनी में जमा खून का थक्का निकालने में सफलता हासिल की है। केजीएमयू में इस तकनीक से पहली बार सफल इलाज किया गया।
डॉ. अमित आनंद ने बताया कि करीब 30 वर्षीय मरीज को सांस फूलने, खांसी के साथ खून आने और ब्लड प्रेशर कम होने जैसी गंभीर शिकायतें थीं। उसे केजीएमयू के मेडिसिन विभाग की मेडिकल इंटेंसिव केयर यूनिट में भर्ती किया था। जांच में फेफड़े की मुख्य धमनी में खून का थक्का बनने की पुष्टि हुई। सामान्य तौर पर इसका इलाज पल्मोनरी थ्रोम्बेक्टॉमी के माध्यम से किया जाता है। इसमें गर्दन या पैर में छोटे से चीरे के माध्यम से कैथेटर डालकर, इमेजिंग की मदद से थक्के को बाहर निकाला जाता है। यह इलाज काफी महंगा होता है और मरीज के परिजन इसे वहन करने में असमर्थ थे।
इसको देखते हुए कैथेटर-डायरेक्टेड पल्मोनरी थ्रोम्बोलाइसिस तकनीक से इलाज का निर्णय लिया। इलाज के लगभग छह घंटे के भीतर मरीज की सांस की तकलीफ और खांसी में खून आने की समस्या में काफी सुधार हो गया।
गले के रास्ते डाला कैथेटर
इस आधुनिक प्रक्रिया में स्वान गैंज कैथेटर को गले की नस के माध्यम से दाहिने हृदय तक पहुंचाया गया। वहां से इसे फेफड़े की मुख्य धमनी तक ले जाया गया। इसके माध्यम से जहां खून के थक्के बने थे, वहीं सीधे थक्का घोलने वाली दवा स्ट्रेप्टोकाइनेज दी गई। यह पूरी प्रक्रिया 2-डी इकोकार्डियोग्राफी, ईसीजी और पल्मोनरी आर्टरी वेवफॉर्म की लगातार निगरानी में की गई। डॉ. अमित आनंद ने बताया कि यह तकनीक बिना बड़ी सर्जरी के खून के थक्कों को हटाने में प्रभावी है। इसमें खून बहने का खतरा कम होता है, जिससे मरीज की सुरक्षा बढ़ती है। मरीज जल्दी ठीक होकर सामान्य जीवन में लौट सकता है।
परंपरागत तकनीक से काफी सस्ती
डॉ. अमित आनंद ने बताया कि यह प्रक्रिया मात्र सात से आठ हजार रुपये में पूरी कर ली गई। सामान्य तौर पर परंपरागत तकनीक से इसके इलाज पर दो से ढाई लाख रुपये का खर्चा आता है। निजी अस्पतालों में यह खर्च साढ़े तीन से चार लाख रुपये तक पहुंच जाता है।