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मंदिर भूली भाजपा, हिंदुत्व चमकाएंगे दूसरे औजार!

Fri, 06 Dec 2013 12:11 PM IST
अखिलेश वाजपेयी/लखनऊ
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अयोध्या का विवादित ढांचा ढहे हुए 21 साल बीत गए। इस मुद्दे पर हाईकोर्ट का फैसला आए भी तीन बरस गुजर गए।
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आम आदमी की जुबान पर वही सवाल आज भी है, जो 21 साल पहले आज की तारीख में था, ‘अब आगे क्या होगा? संबंधित स्थल पर मंदिर बनेगा या मस्जिद या भारत माता मंदिर अथवा यह जगह यूं ही पड़ी रहेगी।’

जो भी हो लेकिन मंदिर मुद्दा अब भाजपा नेताओं की जुबान पर नहीं है।

बदल गया भाजपा नेताओं का रुख
इसका मतलब यह नहीं कि भाजपा या उसके विरोधी सियासी दलों ने ध्रुवीकरण की राजनीति छोड़ सैद्धान्तिक मुद्दों पर चुनावी मैदान में उतरने का संकल्प ले लिया है। उल्टे ऐसा लगता है कि भाजपा नेताओं को इस मुद्दे में पहले जैसी आंच व बात नहीं दिख रही है।
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यही वजह है कि अब वे मंदिर छोड़ दूसरे मुद्दों से हिंदुत्व के औजार को पैना करने की कोशिश हो रही है। इसमें संघ परिवार भी जुटा है और संघ परिवार के विरोध में खड़े सियासी दल भी।

संकल्प दोहराते तक नहीं
लालकृष्ण आडवाणी से लेकर कल्याण सिंह, विनय कटियार, उमा भारती जैसे मंदिर आंदोलन के प्रमुख चेहरे 1992 के बाद शुरुआती कुछ दिनों में हर साल इस तारीख को मंदिर निर्माण का संकल्प दोहराते थे। धीरे-धीरे यह चेहरे इस दिन को भी भूलते चले गए और संकल्प दोहराने की जरूरत भी एजेंडे से बाहर होती गई।

यह बात इससे भी साबित होती है कि जिन नरेन्द्र मोदी को हिंदुत्व का ब्रांड अंबेसडर गढ़कर संघ परिवार ने दुनिया के सामने प्रस्तुत किया। वही मोदी देश को बताते चलते रहे कि वो पिछड़ी जाति के हैं।

मोदी को भी नहीं याद आए 'श्रीराम'
मोदी ने यूपी में हर बात की, उन्हें बय यही याद नहीं रहा कि भाजपा को फर्श से अर्श पर पहुंचाने में अहम भूमिका निभाने वाली अयोध्या उत्तर प्रदेश में ही है। उनके भाषणों में अयोध्या, मथुरा और काशी का जिक्र सुनने को लोग तरस गए। जबकि, भीड़ ‘जय श्रीराम’ के जोरदार नारे लगाकर उनको इसकी याद दिलाने में जुटी रही।

पर, इसका मतलब यह नहीं है कि लोकसभा चुनाव के लिए वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश नहीं हो रही है।

मोदी चाहते हैं, विरोधी उन्हें हिंदुत्ववादी कहें
बात सिर्फ इतनी सी है कि मोदी ही नहीं संघ परिवार के रणनीतिकार भी मंदिर मुद्दे पर उलझे बगैर आगे सफर तय करना चाहते है। इसीलिए मोदी मंदिर मुद्दे पर बोलने से तो परहेज कर रहे हैं। वह पूरी कोशिश करते हैं कि विरोधी उन्हें हिंदुत्ववादी नेता बताते हुए ही हमला बोलें। जिससे उनका काम भी बन जाए और आरोप भी न लगे।

कुछ लोगों का आकलन यह भी है कि मंदिर मुद्दे पर विहिप व भाजपा के बदलती भाषा ने इस मुद्दे को लेकर इन लोगों पर लोगों के भरोसे को डगमगाया है।

इस नाते भी मोदी या संघ परिवार मंदिर मुद्दे को उठाने से बच रहे हैं। इन्हें आशंका सता रही है कि कहीं यह चाल उल्टी न पड़ जाए।

यह वजह भी तो नहीं
मोदी की भाषा में बदलाव के पीछे एक वजह विहिप की तरफ से हाल में ही आयोजित 84 कोसी सहित तमाम सियासी परिक्रमाओं का असफल होना भी माना जा रहा है। यहां दो घटनाक्रमों पर नजर डालें तो पूरी तस्वीर साफ हो जाती है। नरेन्द्र मोदी की रैलियों से पहले विहिप ने अयोध्या मुद्दे पर 84 कोसी परिक्रमा की घोषणा की थी।
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यह ऐलान भी किया कि परिक्रमा के दौरान संत आम लोगों को मंदिर मुद्दे पर नेताओं की पुराने बयान याद दिलाएंगे।

बताएंगे कि सभी राजनीतिक दलों के नेताओं ने कहा था कि वे हर हाल में मंदिर निर्माण के लिए संतों के साथ खड़े होंगे। पर, अब नेताओं ने बोली बदल ली है।

जाहिर है कि यह परिक्रमा मंदिर का आंच व असर नापने के लिए आयोजित की थी। पर, जिस तरह परिक्रमा और इसके बाद 18 अक्टूबर को विहिप की देशभर में मंदिर निर्माण को लेकर संकल्प सभाओं में लोग नहीं जुटे। उसके बाद मोदी व संघ परिवार ने मंदिर मुद्दे पर चुप्पी साध लेना ही ज्यादा उचित समझा होगा।
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