लोकसभा चुनाव 2014 और विधानसभा चुनाव 2017 के चुनाव नतीजों के बाद तमाम राजनीतिक विश्लेषक कह चुके हैं कि नरेंद्र मोदी के चेहरे वाली भाजपा यादव व जाटव के बीच से भी वोट हासिल करने में सफल रही है।
इसलिए 2019 की तैयारी कर रही भाजपा के रणनीतिकारों की नजर वहां यादव व जाटव वोटों पर भी रहेगी, जहां इनके वोट स्थानीय समीकरणों के चलते दूसरे को मिलने वाले नहीं होंगे। दरअसल, जमीनी सच्चाई यह है कि सपा और बसपा भले ही एक साथ आ गई हैं, पर अतीत के घटनाक्रम के चलते तमाम स्थानों पर यादव और जाटव के बीच 36 के रिश्ते हैं।
भाजपा के रणनीतिकारों की दो दशक पहले से पिछड़ों व दलितों में आरक्षण बंटवारा कर चुनावी गणित दुरुस्त करने की कोशिश रही है। राजनाथ सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में सामाजिक न्याय समिति गठित कर उसकी रिपोर्ट के जरिये इस फॉर्मूले को लागू भी किया गया था, पर बाद में न्यायालय से स्थगनादेश के कारण इस पर अमल रुक गया।
प्रदेश में योगी सरकार बनने के बाद भी भाजपा ने इसी रणनीति पर काम शुरू किया। हालांकि इस बार सिर्फ पिछड़ों में आरक्षण बंटवारे की रणनीति अपनाई गई है। समिति की रिपोर्ट आ गई है। इसमें 54 प्रतिशत पिछड़ों को तीन भागों में बांटकर इनको मिल रहे 27 प्रतिशत आरक्षण को क्र्रमश: 7, 11 और 9 प्रतिशत में बांटने की सिफारिश की गई है।
इस रिपोर्ट को कुछ संशोधन के साथ लागू कर भाजपा गैर यादव पिछड़ों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करेगी। पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने के फैसले के सहारे भी पिछड़ों को जोड़ने की कोशिश होगी।
तमाम योजनाओं और विकास के कामों के सहारे लोगों को अपने साथ जोड़ रही भाजपा की तैयारी विधानसभा और लोकसभा के एक-एक क्षेत्र को केंद्रित कर काम करने की है। इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चिट्ठी प्रत्येक परिवार तक पहुंचाकर उसे दी गई सुविधाओं की जानकारी देने की योजना बनाई जा रही है।
उससे पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का पत्र विधायकों के पास पहुंचकर उन्हें बताएगा कि सरकार ने उनके इलाके में क्या-क्या काम कराए और कितना धन खर्च किया।
पार्टी का इरादा पत्र के सहारे लोगों के दिल व दिमाग में यह बैठाना है कि भाजपा सरकार ने उनके सरोकारों का ध्यान रखा है तो समस्याओं का समाधान भी उसके एजेंडे में है।