वैसे तो प्रदेश में विधानसभा चुनाव में अभी दो साल से ज्यादा का वक्त है। पर, संघ परिवार के रणनीतिकार बहुत ज्यादा इंतजार नहीं करना चाहते हैं। वह अभी से 2017 में होने वाले सूबे के चुनावी समर के लिहाज से सारी तैयारी कर लेना चाहते हैं। इस सिलसिले में मकर संक्रांति के बाद से काम शुरू कर दिया जाएगा।
इसके तहत प्रमुख नेताओं व पदाधिकारियों को सीटों की जिम्मेदारी सौंपी जाएगी। साथ ही सामाजिक समीकरणों को दुरुस्त करने के लिए पिछड़े व दलित नेताओं के समूहों को भी मिशन पर लगाया जाएगा।
जानकारी के मुताबिक, जनवरी के अंतिम सप्ताह या फरवरी के प्रथम सप्ताह में प्रदेश के प्रमुख नेताओं के साथ पार्टी हाईकमान की बैठक प्रस्तावित है। यह बैठक दिल्ली में होगी या लखनऊ में। यह अभी नहीं तय है।
बैठक में यूपी में पार्टी की पकड़ को मजबूत बनाने की रणनीति पर विचार-विमर्श होगा। फरवरी के दूसरे सप्ताह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का कानपुर दौरा प्रस्तावित है।
वह कानपुर में पांच दिन रहेंगे। उनके प्रवास के दौरान भी मुख्य रूप से यूपी की चिंता और चुनौतियों से निपटने पर बातचीत प्रस्तावित है। एक दिन संघ परिवार के सभी संगठनों के प्रमुख लोगों की भी बैठक होनी है।
इस तरह तैयार होगा गांवों में आधार
बैठकों में यूपी की चिंता और चुनौतियों से पार पाने की चर्चा तो होगी ही, साथ ही 2017 में यूपी में भगवा टोली को सत्ता व उससे पहले होने वाले पंचायतों तथा विधान परिषद की स्थानीय प्राधिकारी कोटे की सीटों के चुनाव में ज्यादा से ज्यादा सीटों पर कब्जे को लेकर रणनीति का तानाबाना भी बुना जाएगा।
दरअसल पार्टी के रणनीतिकार विधानसभा चुनाव की रणनीति को पंचायतों और स्थानीय प्राधिकारी कोटे की विधान परिषद सीटों के चुनाव में ही आजमा लेना चाहते हैं।
रणनीतिकारों का मानना है कि इन चुनावों के दौरान अगर किसी रणनीति में बदलाव की जरूरत महसूस हुई तो वह हो सकेगी। इसी बहाने विधानसभा चुनाव के लिए गांवों में आधार तैयार किया जा सकेगा।
इस तरह से काम करने की योजना
तय किया गया है कि पंचायत चुनाव के लिए पहले चरण में उन सीटों को तलाशा जाए जहां पर भाजपा प्रत्याशी जीतते रहे हैं अथवा वह दूसरे या तीसरे नंबर पर रहें हों।
ऐसी सीटों को श्रेणीबद्ध कर पार्टी के स्थानीय नेताओं को एक या दो पंचायतों की जिम्मेदारी सौंपने का प्रस्ताव है। इसी तरह प्रदेश स्तरीय पदाधिकारियों व नेताओं को विधानसभा की एक या दो उन सीटों को सौंपने की योजना है जहां विधानसभा के पिछले चुनाव में 20 से 30 हजार तक वोट मिला है।
विधानसभा सीटों के प्रभारी बनाए जाने वाले नेता स्थानीय स्तर पर ग्राम पंचायतों व क्षेत्र पंचायतों के प्रभारियों के साथ मिलकर इन स्थानों पर पार्टी की पकड़ मजबूत करेंगे।
इसके तहत स्थानीय स्तर पर पिछड़े व दलित नेताओं के समूहों का गठन करके उन्हें भी उपयोगिता के लिहाज से क्षेत्रों में भेजा जाएगा।
संगठनात्मक ढांचे में भी प्रयोग
पार्टी का सदस्यता अभियान चल रहा है। भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व के अनुसार सदस्यता अभियान 31 मार्च तक चलना है। उसके बाद संगठनात्मक चुनाव होंगे। रणनीतिकारों की योजना है कि इस बार सामाजिक समीकरणों का ध्यान में रखकर पदाधिकारी बनाए जाएं। जिससे संगठन में हर जाति का प्रतिनिधित्व हो जाए।
खासतौर से उस क्षेत्र में रहने वाली प्रभावी जातियों का। रणनीतिकारों का मानना है कि इस कवायद का फायदा भाजपा को जरूर मिलेगा।
साथ ही उन लोगों को भी पार्टी की सक्रिय गतिविधियों से जोड़ा जा सकेगा जो लोकसभा चुनाव के दौरान बतौर मतदाता संगठन के निकट आए हैं।