मुजफ्फरनगर और शामली दंगों के बाद भाजपा ने वोटों के जिस ध्रुवीकरण को हथियार बनाकर लोकसभा चुनाव में शानदार कामयाबी हासिल की थी, वह अब कुंद पड़ता दिख रहा है। कैराना में मिली हार को भाजपा के लिए बिजनौर और ठाकुरद्वारा में पिछले महीने मिली शिकस्त से कहीं ज्यादा बड़ा सबक माना जा रहा है।
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शामली जिले का कैराना क्षेत्र दंगा प्रभावित रहा है। जिस इलाके में कुछ महीने पहले तक एक वर्ग विशेष के लोगों में समाजवादी पार्टी के प्रति भारी नाराजगी थी, अब उन्होंने ही सपा प्रत्याशी की जीत में अहम भूमिका निभाई।
हरियाणा सीमा से सटे कैराना विधानसभा क्षेत्र को हुकुम सिंह का गढ़ कहा जाता रहा है। वे सात बार यहां से विधायक चुने जा चुके हैं। फिलहाल कैराना लोकसभा सीट से सांसद हैं। उनके इस्तीफे से खाली हुई सीट पर पांच महीने बाद ही भाजपा का जादू फीका पड़ गया।
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वे अपने ही गढ़ में पार्टी की प्रतिष्ठा नहीं बचा पाए। वोटों के ध्रुवीकरण की रणनीति नाकाम रहने से सपा का वोट बैंक तो बढ़ गया लेकिन भाजपा का ग्राफ नीचे चला गया। यह स्थिति तब रही जब भाजपा ने निकट संबंधियों को टिकट न देने की पॉलिसी को तोड़ते हुए रिश्ते में हुकुम सिंह के भतीजे अनिल कुमार को टिकट दिया।
सपा की व्यूह रचना रही कारगर
सपा ने यहां मजबूत व्यूह रचना की थी। गुर्जर वोटों की अच्छी तादाद के मद्देनजर पूर्व मंत्री वीरेंद्र सिंह को चुनाव प्रभारी बनाया। कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश सिंह और राज्यमंत्री रामसकल गुर्जर को प्रभारी मंत्री के तौर पर भेजा।
कश्यप वोटों को लुभाने के लिए पहले ही किरनपाल कश्यप को पार्टी का जिलाध्यक्ष नामित किया। प्रभारी मंत्री के रूप में रामसकल गुर्जर ने लगातार 25 दिन वहीं कैंप किया। बकौल रामसकल, हर जाति को जोड़ने के लिए उनसे जुड़े नेताओं को चुनाव में लगाया गया।
ब्राह्मणों में सेंधमारी का जिम्मा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री मनोज पांडेय को सौंपा गया। कश्यपों में राजपाल कश्यप, कोरी बिरादरी में राज्यमंत्री अरुणा कोरी, वाल्मीकि समाज में जुगल वाल्मीकि और आगरा के मेयर इंद्रजीत आर्य, राजपूतों में पर्यटन मंत्री ओमप्रकाश सिंह के साथ पूर्व विधायक जगत सिंह को लगाया।
अन्य नेताओं को भी जातीय हिसाब से जिम्मेदारी दी गई। सपा नेताओं ने बाबरियों समेत हर जाति के वोटरों तक दस्तक दी।
इन्होंने भी नहीं दिया भाजपा का साथ
इस उपचुनाव में सपा ने दिल्ली में चौधरी चरण सिंह का स्मारक बनाने के मुद्दे को भी भुनाया। हालांकि यह सीट जाट बहुल नहीं है लेकिन हार-जीत में उनकी निर्णायक भूमिका रहती है। लोकसभा चुनाव में जाटों में जिस जज्बे के साथ भाजपा का साथ दिया, वह इस बार दिखाई नहीं पड़ा।
कहीं कम, कहीं ज्यादा, हर गांव में जाट बिरादरी ने सपा प्रत्याशी के पक्ष में मतदान किया। उपचुनाव से तीन दिन पहले 12 अक्तूबर को मेरठ में स्मारक मुद्दे पर हुई रैली में लोकनिर्माण एवं सिंचाई मंत्री शिवपाल सिंह की मौजूदगी और उससे पहले लखनऊ में जयंत चौधरी की मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मुलाकात ने भी रंग दिखाया।
साहब सिंह, राजपाल सिंह, संजय लाठर, कुलदीप उज्ज्वल, मुकेश चौधरी, जयवीर सिंह जैसे नेता सपा के प्रति जाटों के सकारात्मक रुझान को वोट में तब्दील करने में जुटे रहे।
हुकुम सिंह सजातीय गुर्जर वोटों को पूरी तरह एकजुट नहीं रख पाए। सपा ने कई गांवों में गुर्जर वोटों में सेंधमारी की। भाजपा नेताओं का कहना है कि कैराना ब्लॉक में पार्टी ज्यादा पिछड़ गई। इस ब्लॉक की जिम्मेदारी खुद हुकुम सिंह के पास थी।
सत्ता का भी दिखा असर सपा की जीत का अंतर जितना कम रहा है, उसे देखते हुए इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि सत्ता ने भी चुनाव में असर दिखाया है। बहुत सारे गांवों में सपा नेताओं, मंत्रियों ने आचार संहिता को दरकिनार कर कई काम कराए। कहीं फुंके ट्रांसफॉर्मर बदले गए तो कहीं जर्जर लाइनें। इन सबसे भी थोड़ा-बहुत लाभ जरूर हुआ।
मुस्लिम वोटों का भी हुआ बंटवारा ऐसा नहीं कि सिर्फ हिंदू वोटों का भाजपा के पक्ष में ध्रुवीकरण नहीं हुआ। मुसलमान वोट भी पूरी तरह सपा के साथ नहीं रहे। कांग्रेस प्रत्याशी अरशद हसन, सपा उम्मीदवार नाहिद हसन के चाचा हैं। अरशद ने मजबूती से चुनाव लड़ा। उन्हें करीब 17 हजार वोट मिले, उनमें अधिकतर मुस्लिम मतदाता हैं। इसके बावजूद सपा के पक्ष में विभिन्न जातियों के कम-ज्यादा वोटों से नाहिद की जीत की राह खुल गई।