कहावत है कि लागी जल्दी छूटती नहीं तो अगर भाजपा नेताओं को आज भी कुशवाहा की याद आ रही है, तो इसमें बुरा क्या है।
पिछले दिनों भाजपा के एक नेता ने यह सवाल क्या उठा दिया कि एक ही आरोप में फंसे बाबू सिंह कुशवाहा को तो जेल भेज दिया गया लेकिन मायावती को छुआ तक नहीं गया।
मानों उन्होंने बर्र के छत में हाथ डाल दिया है। लोगों का निष्कर्ष है कि यह भाजपा नेताओं की कुशवाहा से सहानुभूति है। जिसकी वजह से उन्हें यह हजम नहीं हो रहा है कि सारी कार्रवाई कुशवाहा पर ही हो रही है।
अलबत्ता पार्टी में तमाम लोग ऐसे हैं जो इसमें भी अपने नेताओं की रणनीति की तारीफ करके अपने हाथ अपनी पीठ थपथपाने में जुटे हैं।
इनका तर्क है कि पार्टी नेताओं ने जानबूझकर ऐसा कराया। उन्होंने कुशवाहा को अपने परिवार को सपा में भेजने की राजी किया। जिससे कुशवाहा की साया से भाजपा मुक्त हो सके और नुकसान सपा के खाते में चला जाए।
सच तो ऊपर वाला जाने लेकिन मुलायम की पार्टी को इससे अभी तक कोई नुकसान न होता देख यह तर्क देने वाले भाजपाइयों को जरूर कुशवाहा की बात चलते ही अगल-बगल खिसक जाने को मजबूर हो जाना पड़ रहा है।