समस्याओं से जनता को रंगमंच के जरिये रूबरू कराने वाले लेखक थे भारतेंदु हरिश्चंद्र। ‘अंधेर नगरी’, ‘भारत दुर्दशा’ और ‘सत्य हरिश्चंद्र’ सरीखे नाटक इसकी बानगी हैं।
इतना ही नहीं हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने और उसे अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के करीब लाने का श्रेय भी इन्हीं को जाता है।
मंगलवार को भारतेंदु हरिश्चंद्र की 164वीं जयंती है। इस अवसर पर भारतेंदु नाट्य अकादमी में ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए’ का मंचन किया जाएगा।
प्ले दो कहानियों पर आधारित है, जिसमें से एक कहानी साहित्यकार शरत जोशी की है। उल्लेखनीय है कि 9 सितंबर, 1850 को जन्में भारतेंदु हरिश्चंद्र पांच साल की उम्र से ही काव्यपाठ करने लगे थे और 16 वर्ष की उम्र में ‘कवि वचन सुधा’ नामक पत्र निकाला।
उन्होंने हिंदी को नई चाल व ढाल देने का काम भी किया। चूंकि, उन दिनों राजभाषा फारसी से अन्य बोलियां प्रभावित थीं।
इसलिए हिंदी की साहित्यिक परंपरा को बचाने के लिए रंगमंच, आंदोलन, सभाओं से लेकर डिबेटिंग क्लब, अनाथरक्षिणी तदीय समाज, काव्य समाज और पेनीरीडिंग समाज जैसी संस्थाएं स्थापित कीं।
उन्होंने उर्दू की तरक्की के लिए भी काम किया। भारतेंदु हरिश्चंद्र को ‘हरिश्चंद्र’ की उपाधि की आवाज मृत्यु से चार साल पहले उठी।
वह भी ‘सारसुधानिधि’ पत्रिका में छपे लेख के जरिये, जिसकी धमक यूरोप तक थी। यूरोपीय उन्हें उत्तर भारत का राजकवि मानते थे। भारतेंदु अंग्रेजी हुकूमत की मुखालफत करते थे, पर अंग्रेजों का अनुशासन उन्हें खासा प्रिय था।
भारतेंदु हरिश्चंद्र ने सत्य हरिश्चंद्र, मुद्राराक्षस, विद्या सुंदर, चंद्रावली, भारत दुर्दशा, अंधेर नगरी, मृच्छकटिक, रत्नावली, प्रेम योगिनी, नीलदेवी जैसे नाटक, रामलीला, हमीरमठ, राजसिंह, एक कहानी कुछ आप बीती, कुछ जग बीती, सुलोचना, शीलवती, सावित्री चरित्र उपन्यास और प्रेम फुलवारी, प्रेमरंग, होली, दानलीला, वर्षाविनोद, सतसई शृंगार, चित्रकाव्य आदि काव्य कृतियां लिखीं।