एक वक्त था जब बेटियों को खुद अपने अधिकारों के लिए जूझना पड़ता था, पर वक्त के साथ काफी कुछ बदला है।
थोड़ा बदलाव समाज में हुआ है और बेटियों की जेहनियत ने भी उन्हें इस मुकाम पर लाकर खड़ा किया है।
अब बेटियां समाज और देश की तरक्की की भागीदार हैं। देश जिस रथ पर चल रहा है, उसके पहिये अगर बेटे हैं तो बेटियां भी हैं।
फिर भी बदलाव की एक लंबी दास्तां अभी लिखी जानी बाकी है। इस बदलाव को साकार करने के लिए बेटियों को अपने कुछ अधिकारों से रूबरू होना जरूरी है। ऐसे ही अधिकारों के बारे में पढ़िये यहां।
1. ताकि महिलाएं और बेटियां बनें उद्यमी
प्रदेश में 75 हजार पंजीकृत स्मॉल स्केल इंडस्ट्रीज (एसएसआई) में से सिर्फ 6.80 फीसदी महिलाओं के नाम पर है। वहीं बड़े उद्योगों में भी उनकी संख्या बढ़ाने की जरूरत महसूस की जा रही है।
नए कंपनी लॉ बिल में बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में एक महिला सदस्य की अनिवार्यता लागू की गई है। कई सरकारी योजनाओं और छूट के जरिए भी महिलाओं व बेटियों को प्रेरित किया जा रहा है कि वे उद्योगों में अधिक से अधिक भागीदारी दें।
देश की करीब 1 करोड़ एसएसआई इकाइयां हैं, जिनमें 10 प्रतिशत महिलाओं के स्वामित्व में है। जाहिर है, आंकड़ा बढ़ाने की जरूरत है।
इसके लिए प्रधानमंत्री रोजगार योजना में लाभ लेने के लिए महिलाओं को प्रेरित किया जाता है। क्लस्टर डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत जहां अन्य उद्योगों को 30 से 80 प्रतिशत विकास राशि दी जाती है, महिलाओं के स्वामित्व वाली इकाइयों में यह 90 फीसदी तक दी जाती है।
क्रेडिट गारंटी फंड स्कीम लोन का 75 फीसदी कवर किया जाता है, लेकिन महिलाओं के स्वामित्व वाली इकाइयों में यह 80 फीसदी रहता है। सरकार महिला उद्यमी प्रोत्साहन योजना के तहत 12वीं पास बेटियों को 2.5 लाख तक का लोन दे रही है।
बैंकों से प्रोत्साहन
विभिन्न बैंक महिला उद्यामियों को 0.25 से 1 प्रतिशत तक कम ब्याज दर पर लोन देते हैं। बैंक ऑफ इंडिया की प्रियदर्शिनी योजना स्कीम में 5 लाख तक के लोन पर कोलेट्रल सिक्युरिटी नहीं ली जाती। ओरिएंटल बैंक 10 लाख तक के लोन में 2 प्रतिशत छूट और कोई कोलेट्रल नहीं, जैसी सुविधा देता है।
एसबीआई का स्त्री शक्ति पैकेज 5 लाख तक केलोन में सिक्युरिटी नहीं लेता। एसबीआई और केनरा बैंक महिला उद्यमियों के लिए विशेष सैल चला रहे हैं जहां उन्हें कंसल्टेंसी, काउंसलिंग और मार्केटिंग के तौर तरीका सिखाते हैं।
यूपी सरकार ने विभिन्न शिक्षण संस्थानों में बीए, बीएससी व बीकॉम जैसे कोर्सेस में दाखिले केलिए 25 फीसदी सीटें आरक्षित की हैं। छात्राओं के लिए दाखिले के लिए सबसे अधिक अवसर राजधानी में ही हैं।
फीस नहीं
सिर्फ सीटें ही नहीं उच्च शिक्षा में छात्राएं अधिक से अधिक संख्या में पढ़ें इसलिए सरकारी व सहायता प्राप्त कॉलेजों में छात्राओं की ट्यूशन फीस माफ कर दी गई है। वहीं एलयू व उससे संबद्घ लॉ कॉलेजों में छात्राओं को दाखिले में पांच प्रतिशत का वेटेज दिया जाता है।
डीएवी पीजी कॉलेज जहां पहले कभी लड़के ही पढ़ते थे अब यहां पर हर कोर्स में छात्राओं की संख्या बढ़ाने के लिए पांच प्रतिशत का अतिरिक्त वेटेज दिया जा रहा है।
यूपीटीयू में 20 प्रतिशत आरक्षित
उप्र प्राविधिक विश्वविद्यालय (यूपीटीयू) में बीटेक, बीफॉर्मा, बीएचएमसीटी सहित विभिन्न कोर्सेज में दाखिले के लिए 20 प्रतिशत सीटें आरक्षित की गई हैं। यहां छात्राओं को दाखिले के लिए वरीयता दी जाती है। ताकि अधिक से अधिक संख्या में छात्राएं यहां पर पढ़ सकें। फिलहाल छात्राओं को शिक्षा में कई सुविधाएं मिल रही हैं।
जेईई एडवांस में निशुल्क रजिस्ट्रेशन
आईआईटी-जेईई एडवांस 2014 के रजिस्ट्रेशन के लिए बेटियों को फीस नहीं देनी होगी। वहीं जेईई मेन में फीस पर 50 प्रतिशत की छूट दी जा रही है। इस टेस्ट में देश के लगभग 12 लाख अभ्यर्थी शामिल होते हैं लेकिन लड़कियों की संख्या 20 प्रतिशत से भी कम रहती है।
12वीं पास कर चुकीं गरीब वर्ग की छात्राओं को प्रदेश सरकार द्वारा इस योजना में 20 हजार रुपए दिए जाते हैं। बीते वर्ष करीब पौन पांच लाख लड़कियों ने इसका लाभ उठाया था। इस बार संख्या और भी बढऩे की उम्मीद है।
3. संविधान करता है अधिकारों की सुरक्षा
भारतीय संविधान ने बेटियों की सुरक्षा के लिए न केवल समानता बल्कि सशक्तिकरण के लिए भी विधान किए हैं। उनकी सामाजिक-आर्थिक, शैक्षिक और राजनीतिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए संविधान निर्माताओं ने इन प्रावधानों को जरूरी माना और आज इन प्रावधानों की जानकारी और सख्त अनुपालन जरूरी है।
समानता सुनिश्चित
संविधान की धारा 14 में सभी महिलाओं को कानून केसमक्ष बराबर माना गया है। धारा 15 में कहा गया है कि देश में लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं होगा। धारा 15-3 कहती है कि सरकार को महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष व्यवस्थाएं करनी होंगी ताकि इनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
धारा 16 में उन्हें सभी भारतीय नागरिकों के बराबर मानते हुए सभी को रोजगार में बराबरी का दर्जा दिया गया है। धारा 39-डी के मुताबिक पुरुष और औरत दोनों को समान काम का समान पैसा मिलेगा।
धारा 42 कहती है कि सभी को कार्यस्थल पर अच्छा माहौल मिले और महिलाओं को मातृत्वकाल के दौरान सहयोगत्मक रवैया अपनाया जाए।
सम्मान की सुरक्षा जरूरी
धारा 51-ए-ई में जहां देशवासियों में सौहार्द और भ्रातृत्व की भावना के विकास की बात कही गई है वहीं यह भी कहा गया है कि ऐसे सभी गतिविधियां जिसमें महिलाओं के सम्मान को ठेस पहुंचती है, उसे बंद किया जाना चाहिए।
पंचायतों में आरक्षण
संविधान अपनी धारा 243-डी-3 में कहता है कि देश की सभी पंचायतों को मिलाकर कम से कम 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित रहेंगी। इनमें एससी-एसटी सीटें भी शामिल हैं। वहीं इसी धारा में डी-4 प्रावधान कहता है कि पंचायतों के 33 प्रतिशत मुखिया पदों पर महिलाएं होंगी। धारा 243-टी-3 में म्युनिसिपल्टी में यह आरक्षण लागू किया गया।
4. वर्किंग वूमन को हैं ढेरों अधिकार
कार्यस्थल पर यौन उत्पीडऩ से सुरक्षा कानून 2013 के तहत पीडि़त महिलाएं पुलिस में ऐसे मामलों की शिकायत कर सकती हैं। दफ्तर में अगर कोई सहकर्मी या अधिकारी या कोई भी कर्मचारी उन्हें जबरन शारीरिक संबंध बनाने के लिए कहता है या यौन उत्पीडऩ करता है तो उसके खिलाफ शिकायत की जा सकती है।
उत्पीडऩ में अश्लील एसएमएस, एमएमएस, ईमेल, सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर कमेंट भेजने से लेकर गैर-जरूरी छूना और पीछा करना शामिल है।
ऐसी शिकायतों के लिए दफ्तरों में कमेटी होनी चाहिए, अगर नहीं है तो जिला कमेटी में शिकायत की जा सकती है। यहां 90 दिन में जांच पूरी करके पीडि़त महिला को इंसाफ दिलाने का नियम है। महिला को अधिकार है कि वह इस दौरान सवैतनिक अवकाश पर रहे।
मैटरनिटी लीव
अक्सर देखने में आता है कि महिलाएं गर्भावस्था के दौरान अपना काम छोड़ देती हैं। लेकिन मातृत्व लाभ अधिनियम 1961 सेक्शन - 4 ने उन्हें अधिकार दिया कि है कि वे इस छह सप्ताह सवैतनिक अवकाश पर रहें। अगर कंपनी उन्हें छुट्टïी नहीं देती है तो महिला कंपनी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सकती है।
जरूरत क्रेश की
मनरेगा में जिस तरह महिलाओं को अपने बच्चे को काम पर लाने की छूट मिली है और एक महिला उनकी देखभाल के लिए नियुक्त होती है, उसी तरह शहरों में बड़े कार्यालयों में क्रैच जैसी सुविधा चाही जाने लगी है। कई विभाग इस ओर काम कर रहे हैं।
5. बेटियों को हिंसा के विरुद्ध सुरक्षा
घरेलू हिंसा और यौन हिंसा के तौर पर दो बड़े खतरे महिलाओं के सामने आए हैं। वे घर में सुरक्षित रहें और बाहर निकलें तो निर्भीक होकर चलें, इसके लिए कानून में कई व्यवस्थाएं हैं।
घरेलू हिंसा से सुरक्षा
इस कानून के तहत बेटियों को घर में होने वाली हिंसा के खिलाफ संरक्षण अधिकारी, कानूनी सहायता, काउंसलिंग, आदि की सुविधाएं दी जाती हैं। वहीं मां को बच्चे की अस्थायी कस्टडी दी जाती है, और 3 दिन में मजिस्ट्रेट के पास सुनवाई होती है।
दहेज उत्पीडऩ का शिकार महिलाओं को कानूनी सहायता के लिए 2.5 हजार रुपये दिए जाने का नियम है। इसके लिए जरूरी है कि अदालत में आरोप पत्र दाखिल हो चुका हो।
यौन हिंसा में सहायता
बलात्कार के मामलों में महिला को 1.20 लाख रुपये की मदद दी जाती है। आधी धनराशि एफआईआर, मेडिकल और आरोप पत्र दाखिल होने पर, जबकि आधी धनराशि अदालत से दोष सिद्ध होने पर मिलती है। वहीं नाबालिग की हत्या की स्थिति में परिवार को 2.5 लाख रुपये दिए जाते हैं।