बीकेटी/लखनऊ। गोमती की इटौंजा के लुधौली गांव के पास मिलने वाली सहायक बेलवा नदी का पानी गर्मियां आने से पहले ही सूख गया है। इससे गोमती नदी को मिलने वाले पानी की आपूर्ति भी रुक गई है। केवल बेलवा नदी ही नहीं जमखनवा गांव के पास गिरने वाले साफ पानी के नाले में भी प्रवाह नहीं बचा है। इसने संकेत दे दिए हैं कि आने वाले दिनों में गोमती में पानी का बहाव अपने औसत स्तर से नीचे ही रहेगा।
लखनऊ में गोमती नदी के प्रवेश करने के बाद इटौंजा में जमखनवा गांव के राम मंदिर के पास एक नाला बहादुरपुर गांव की तरफ से गिरता है जो गोमती में प्रवाह बढ़ाने में सहयोग करता है। यह नाला पूरी तरह सूखा हुआ है। लुधौली गांव के पास बेलवा नदी गोमती से मिलती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि करीब 10 साल पहले तक यह नदी पूरे साल बहती थी। गर्मियों में पानी का बहाव जरूर कुछ कम हो जाता था। अब तो यह नदी गर्मियां शुरू होने से पहले ही सूख जाती है। यह नदी भी गोमती की तरह ही स्थानीय स्त्रोत और भूगर्भ जल स्त्रोत पर निर्भर है।
इस नदी और नाले का पानी लोग अपने खेतों में सिंचाई के लिए भी इस्तेमाल करते हैं। अब गर्मियों में नदी व नाले में पानी नहीं बहने से सिंचाई की जरूरत भी पूरी नहीं हो पाती है। पिछले कई सालों से सहायक नदियों और नालों के सूखने से गोमती नदी के अलावा भूगर्भ जल का स्तर भी गिर रहा है।
तालाब, झीलों पर हो रहे कब्जे
इटौंजा के ज्यादातर तालाबों और झीलों में कई लोगों का अतिक्रमण हो चुका है, जिसके चलते यह तालाब और झील लगातार आकार में सिकुड़ रहे हैं। इन तालाबों से अवैध कब्जों को हटाने के लिए कई बार तहसील प्रशासन के अधिकारियों से शिकायतें भी की गई, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।
काम कराए जाने की जरूरत
तहसील प्रशासन लगातार अभियान चलाकर झील और तालाब की जमीन से अवैध कब्जे हटाता है। गोमती नदी की सहायक नदियों और नालों में जल संरक्षण की जरूरत है। शासन अगर कार्ययोजना तैयार करे तो गोमती की स्थिति काफी सुधर सकती है।
- विवेकानंद मिश्रा, तहसीलदार बख्शी का तालाब
सहायक नदियों की अनदेखी ठीक नहीं
प्रशासन को समझना होगा कि सहायक नदियों के अलावा झील और तालाब गोमती नदी का प्रवाह बढ़ाने के लिए जरूरी हैं। गोमती का प्रवाह बढ़ने का फायदा लखनऊ के लोगों को ही प्रत्यक्ष रूप से मिलेगा। नदी हमारी पानी की जरूरत के अलावा पर्यावरण को भी अनुकूल बनाने में मदद करती है। सहायक नदियां अगर खत्म होंगी तो यह गोमती को खत्म करने जैसा है।
- वेंकटेश दत्ता, पर्यावरणविद