मुजफ्फरनगर दंगों ने मकबूल शायर बशीर बद्र को भी हिला कर रख दिया है।
न्यूज चैनलों पर दौड़ती खबरों और अपनों के फोन कॉल ने भोपाल में रह रहे बशीर साहब को इतना बेचैन कर दिया है कि उन्हें वे दिन याद आने लगे जब मेरठ में हुए दंगों में उनका घर जला दिया गया था।
वे पुरानी दर्दभरी यादों में डूबते-उतराते तो हैं, पर उन दिनों की रोशनी में वे मुजफ्फरनगर के हालात पर कुछ नहीं कहना चाहते।
बस इतना कहते हैं कि नफरत की सियासत बंद होनी चाहिए। तोड़ने की सियासत अंत में खाली हाथ ही भेजती है। हां, इस मौके पर उनके लबों पर कुछ शेर बेसाख्ता आ ही जाते हैं।
नफरत को मोहब्बत का पैगाम सुनाता हूंमैं लाल पिसी मिर्चें पलकों से उठाता हूं।
एक दूसरा शेर सुनाते हैं-
सात संदूकों में भर कर दफ्न कर दो नफरतेंआज इंसा को मोहब्बत की जरूरत है बहुत
इतना कहते-कहते शायद उन्हें फिर पुराने दिन याद आते हैं, तभी तो मेरठ दंगों के बाद कहा गया शेर गुनगुनाते हैं-
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने मेंतुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में
उनकी बेगम राहत बद्र ने अमर उजाला को बताया कि बशीर साहब ने उस समय तो किसी तरह से दंगों के दंश को सह लिया था, पर डाक्टर कहते हैं अवचेतन पर उनका बहुत गहरा असर पड़ा।
पहले उन दिनों को याद करके अक्सर डिप्रेशन में चले जाते थे पर अब उम्र ढलने पर असर अन्य तरीकों से दिखाई पड़ रहा है। मुजफ्फरनगर जैसी वारदातों के बारे में सुनने के बाद कभी कभी अनकॉन्सस हो जाते हैं।
खासतौर से बच्चों और बेकसूरों पर दंगों का दंश उन्हें बहुत सालता है। ऐसे ही एक हादसे पर उन्होंने शेर पढ़ा था..
यहां एक बच्चे के खून से जो लिखा है, उसे पढ़ेंअभी कीर्तन तेरा पाप है, अभी मेरा सजदा हराम है।
हम लोग कोशिश करते हैं कि अब उम्र के इस पड़ाव में उन्हें कोई दिल तोड़ने वाली खबर न सुनने को मिले। पर फिर भी... एक ठंडी सांस के राहत भी कहती है कि खुदा करें नफरत के गुबार मुजफ्फरनगर की फिजां से जितना जल्द हो गायब हो जाए, बेहतर होगा।
शायरी और बशीर बद्र को थोड़ा भी जानने वाले जानते हैं कि मेरठ दंगों से मर्माहत होकर उन्होंने यह गजल पढ़ी थी जो सरहद पार तक सराही गई थी-
यूं ही बेसबब न फिरा करो, कोई शाम घर भी रहा करोवो गजल की सच्ची किताब है, उसे चुपके-चुपके पढ़ा करो।
मुझे इश्तिहार सी लगती हैं मोहब्बतों की कहानियांजो लिखा नहीं पढ़ा करो, जो कहा नहीं सुना करो।
कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक सेये नए मिजाज का शहर है, जरा फासले से मिला करो।