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बदलती सियासत : पिछड़े-दलित समीकरण ने साधी मुलायम-कांशीराम की दोस्ती, पर कद हुए कद्दावर.. तो टकराए अहंकार

Wed, 24 Nov 2021 05:32 AM IST
दुष्यंत शर्मा अखिलेश वाजपेयी

सार

वर्ष 1989 के बाद प्रदेश में शुरू हुआ राजनीतिक अस्थिरता का दौर 1993 के चुनाव के बाद भी जारी रहा। अयोध्या में 6 दिसंबर 1992 को विवादित ढांचा ध्वंस के बाद से जारी राष्ट्रपति शासन के दौरान 1993 के चुनाव का शंखनाद हुआ। इस दौर की सियासत में नए और दिलचस्प प्रयोग सामने आए।
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मुलायम सिंह, कांशीराम
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विस्तार
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परिदृश्य 1993: कमंडल और मंडल की हवा के बीच सपा-बसपा ने गठबंधन कर दलित-पिछड़ा एकजुटता के फॉर्मूले पर मंदिर व हिंदुत्व की चालों के मुकाबले के लिए चौसर बिछाई। मुलायम सिंह यादव और कांशीराम ने डॉ. राममनोहर लोहिया के ‘संसोपा ने बांधी गांठ, पिछड़े पाए सौ में साठ’ और कांशीराम के ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ के सपने को साकार करने की दिशा में कदम बढ़ाए। 

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‘मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम’ नारा देकर चुनावी लड़ाई धर्मनिरपेक्षता बनाम सांप्रदायिकता की बनाई गई। इस दौर के चुनावी कोख से निकले समीकरणों ने मुलायम को दूसरी बार मुख्यमंत्री बनाया तो मायावती के रूप में प्रदेश को पहला दलित मुख्यमंत्री भी दिया। पर, महत्वाकांक्षा के टकराव ने सरकार को अल्पायु का कर दिया। रही बात कांग्रेस की तो वह 41 से सिमटकर 28 सीटों पर पहुंच गई।

भाजपा के पक्ष में चल रही हिंदुत्व की बयार के सामने सपा व बसपा का जातीय समीकरण कोई बड़ा करतब नहीं दिखा पाया। अलबत्ता सपा-बसपा गठबंधन ने कांग्रेस सहित अन्य कुछ दलों के बाहर से मिले समर्थन से 177 विधायकों वाली सबसे बड़ी पार्टी भाजपा को सत्ता में आने से रोक जरूर लिया। हालांकि, बाद में ‘स्टेट गेस्ट हाउस कांड’ के रूप में राजनीति में वैचारिक की जगह शारीरिक लड़ाई को वह विभत्स रूप सामने आया जिसने दोस्ती-दुश्मनी का ऐसा अध्याय लिख डाला, जिसका इससे पहले प्रदेश की राजनीति में कोई उदाहरण नहीं मिलता। प्रदेश ने दो साल के भीतर मुलायम व मायावती के रूप में दो मुख्यमंत्री देखे, लेकिन कोई भी टिकाऊ सरकार नहीं दे पाया।
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कांग्रेस की राहें हुईं और मुश्किल
दलित व पिछड़ी जातियों के जोड़ वाला समीकरण भले ही मुलायम व मायावती सरकार को लंबी उम्र नहीं दे पाया, लेकिन इन वर्गों को उनकी राजनीतिक ताकत का अहसास जरूर करा दिया। अपने बीच के ही किसी को जिताने की इन वर्गों की रणनीति ने कांग्रेस के बचे-खुचे जनाधार को भी समेटना शुरू कर दिया। वर्ष 1990 में कारसेवकों पर गोली चलाने के बाद मुलायम सिंह सरकार को समर्थन देकर उसे कुछ महीने टिकाए रखने के आरोपों ने उसे हिंदुओं के बीच कमजोर किया तो वहीं 1993 के सपा-बसपा के प्रयोग ने उसकी जड़ें कमजोर कर डालीं। राजनीतिक अस्थिरता ने हरिशंकर तिवारी, अतीक अहमद जैसे बाहुबलियों की राजनीति में पूछ बढ़ा दी। इससे उत्साहित बाहुबलियों ने तेजी से राजनीति की ओर रुख किया।

जिस यात्रा ने कल्याण को बना दिया नायक
अयोध्या में 6 दिसंबर 1992 को कारसेवकों के विवादित ढांचा को ढहा देने के बाद प्रदेश में हिंदू व मुस्लिम ध्रुवीकरण चरम पर पहुंच गया था। बड़ी संख्या में भाजपा नेताओं पर मुकदमे हो चुके थे। लिब्राहन आयोग की जांच शुरू हो चुकी थी। दूसरी तरफ  मंडल कमीशन के पिछड़ों को आरक्षण देने के फैसले के सहारे मुलायम व अन्य समाजवादी नेता और दलितों में राजनीतिक चेतना पैदा कर रहे कांशीराम, हिंदुत्व की सियासी बयार की गति को थामने में जुटे थे।

]हिंदुत्व बनाम जाति के सियासी दांव की जोर-आजमाइश के बीच संघ परिवार ने चार जनादेश यात्राएं निकालने की घोषणा कर एक तरह से मंदिर मुद्दे पर जनमत संग्रह का एलान कर दिया। प्रदेश में एक यात्रा कल्याण सिंह के नेतृत्व में निकली। चार यात्राओं में कल्याण की यात्रा ही ऐसी थी, जिसकी राह लोग आंधी-पानी के बीच भी आधी-आधी रात तक ताकते थे। कल्याण की गाड़ी जहां से गुजरती थी या वह जहां से उतरकर मंच तक पैदल जाते थे, लोग वहां की धूल तक उठाकर माथे पर लगाने को आतुर नजर आते।
 

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जिस साक्षात्कार को पढ़कर कांशीराम से मिले थे मुलायम

संघ परिवार के रणनीतिकारों को पूरा भरोसा था कि राम लहर के सामने मंडल की लहर टिक नहीं पाएगी और भाजपा प्रदेश में फिर सरकार बना लेगी, पर ऐसा हो नहीं पाया। सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने के बावजूद उसे विपक्ष में बैठना पड़ा। बदले समीकरण में धुर विरोधी कांग्रेस के समर्थन से मुलायम सिंह यादव ने दूसरी बार मुख्यमंत्री पद संभाला।
  • वर्ष 1993 के विभिन्न रास्तों से होकर गुजरने वाली इस कहानी को समझने के लिए एक नजर 1991 के लोकसभा चुनाव पर डालना जरूरी है। क्योंकि तभी मुलायम और कांशीराम की दोस्ती के साथ ही मुलायम के दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने का कारण पता चलेगा।
  • कांशीराम प्रदेश की राजनीति में अपनी पहचान बना चुके थे। दलित आबादी के बीच भावनात्मक रूप से उनकी पकड़ निरंतर मजबूत हो रही थी। बात 1991 के शुरुआत की है। साइकिल से घूम-घूम कर अनुसूचित जातियों को उनके वोट की ताकत याद दिलाने वाले कांशीराम का साक्षात्कार छपा, जिसमें उन्होंने कहा था कि मुलायम से वह हाथ मिला लें तो यूपी से सभी दलों का सूपड़ा साफ हो जाएगा।
  • इसी साक्षात्कार को पढ़ने के बाद मुलायम कांशीराम    से मिलने दिल्ली स्थित उनके आवास पहुंचे। इसी मुलाकात में कांशीराम व मुलायम में नए समीकरणों    पर विस्तार से बात हुई।
...पर दूर तक नहीं चल सका यह सफर

वर्ष 1991 में विधानसभा चुनाव हुए तो कांशीराम ने मुलायम सिंह यादव के खिलाफ जसवंतनगर विधानसभा क्षेत्र में बसपा का कोई उम्मीदवार नहीं उतारा। लोकसभा चुनाव में हिंसा के चलते इटावा में फिर चुनाव हुआ तो कांशीराम भी चुनाव लड़ने मैदान में उतरे।

सियासी धुरंधर मुलायम समझ चुके थे कि पिछड़ों व दलितों की एकजुटता उन्हें राजनीतिक रूप से काफी ताकतवर बना सकती है। लिहाजा वह कांशीराम की जीत के लिए अपनी जनता पार्टी के उम्मीदवार रामसिंह शाक्य को चुनावी मैदान में भगवान और भाग्य के भरोसे छोड़ने से भी नहीं हिचके। वरिष्ठ पत्रकार विजय शंकर पंकज बताते हैं कि मुलायम सिंह यादव ने कांशीराम के लिए इटावा में न सिर्फ होटल अनुपम में रुकने का इंतजाम कराया बल्कि प्रतिदिन हालचाल भी लेते थे। होटल के सभी 28 कमरे कांशीराम के लिए बुक करा दिए गए थे। कांशीराम यह चुनाव जीतकर पहली बार लोकसभा पहुंचे।

कांशीराम के कहने पर मुलायम  सिंह ने बनाई समाजवादी पार्टी


कांशीराम की जीत के लिए मुलायम ने जिस तरह अपने उम्मीदवार रामसिंह शाक्य को दांव पर लगाया था, उसके चलते उनके व रामसिंह के बीच काफी दिनों तक अनबन भी रही। पर, मुलायम की नजर भविष्य पर टिकी थी। कांशीराम ने ही मुलायम को पिछड़ों को लामबंद करने का गुर समझाते हुए अपनी पार्टी बनाने की सलाह दी। इसी के बाद मुलायम ने 1992 में समाजवादी पार्टी का गठन किया।

कांशीराम की निगाह दिल्ली पर थी, इसलिए किया समझौता : सभी पार्टियां चुनाव की तैयारी में जुटी थीं। मुलायम व कांशीराम की दोस्ती परवान चढ़ी और दोनों पार्टियों ने पहली बार चुनावी गठबंधन कर भाजपा को पटखनी देने की तैयारी की। दोनों नेताओं के बीच तय हुआ कि लोकसभा चुनाव में बसपा 60 और सपा 40 प्रतिशत सीटों पर लड़ेगी, जबकि विधानसभा चुनाव में सपा ज्यादा सीटों पर लड़ेगी। कांशीराम की निगाह दिल्ली की गद्दी पर थी। सपा-बसपा का गठबंधन हुआ। नारे लगे, ‘मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम’।

बड़ा दल, फिर भी सत्ता से बाहर बैठी भाजपा
बसपा ने 164 उम्मीदवार मैदान में उतारे जबकि मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी ने 256 प्रत्याशी खड़े किए। सपा व बसपा में गठबंधन के बावजूद 176 सीटें ही उनके हिस्से आईं। सपा को 109 तो बसपा को 67 सीटें मिलीं।

भाजपा 177 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। पर,  कुछ अन्य दलों के समर्थन से मुलायम सिंह के नेतृत्व में गठबंधन की सरकार बनी।
मुलायम दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। सपा-बसपा गठबंधन ने 4 दिसंबर 1993 को प्रदेश की सत्ता संभाली।

मुलायम-मायावती में खटपट
बसपा ने इससे पहले यूपी में 15 से ज्यादा सीटें नहीं जीती थीं। सपा के साथ गठबंधन पर उसे 67 सीटें मिलीं। कांशीराम ने पार्टी की उपाध्यक्ष रहीं मायावती को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बना दिया। प्रभारी के रूप में वे अप्रत्यक्ष रूप से पूरी सरकार ही चलाने की कोशिश करने लगीं। इसके बाद, मुलायम बसपा से पीछा छुड़ाने की कोशिश करने लगे। उन्होंने पहले जनता दल, भाकपा और माकपा के विधायकों को तोड़ा और फिर बसपा के विधायकों पर डोरे डालने शुरू कर दिए।
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