बुंदेलखंड के बीहड़ों पर एक जाति विशेष के डाकुओं का कब्जा था। जो लगातार पुलिस के लिए नासूर बन रहे। पुलिस ने इन डकैतों पर काबू पाने के लिए कोल बिरादरी के बिगड़ैल लड़कों का सहारा लिया और आपस में ही भिड़ाने लगे। बबुली कोल इतना बड़ा डाकू बन जाएगा इसका अंदाजा पुलिस को भी नहीं था।
अभी पिछले ही महीने बबुली कोल ने एक साथ तीन लोगों के सिर सिर्फ इसलिए कलम कर दिए क्योंकि उन पर पुलिस का मुखबिर होने का शक था। पिछले कुछ दिनों से यह गिरोह हर हफ्ते बड़ी वारदात कर रहा था। बबुली कोल को ढेर करने का खाका पुलिस ने पिछले महीने बनाया था। बबुली अब चारो तरफ से घिर चुका है।
मुठभेड़ में एक गोली उसे भी लगी है वह जंगल में ही कहीं छिपा है। दूसरी ओर ललित पटेल को मध्य प्रदेश पुलिस इसी महीने के शुरुआत में ढेर कर चुकी है जबकि 50 हजार के इनामी गोपा यादव को यूपी एसटीएफ गिरफ्तार कर चुकी है।
दरअसल बांदा और चित्रकूट में डकैतों का आतंक 70 के दशक से है। जब फतेहगंज थाना क्षेत्र का रहने वाला खरदूषण लोध और बदौसा थानाक्षेत्र के राजा रगौली के बीच वर्चस्व की लड़ाई शुरू हुई। दोनों के बीच टकराव से एक के बाद एक डकैत इस क्षेत्र की पहचान बनते रहे। पुलिस के दबाव में इनका वर्चस्व घटा तो बाबा पनपने लगा और 70 के दशक के अंत में उसने सरेंडर कर दिया और राजनीति में आ गया।
32 साल रहा था ददुआ का वर्चस्व
चित्रकूट के देवकली गांव में रामपटेल सिंह के घर में पैदा हुआ ददुआ 22 साल की उम्र में अपने ही गांव के आठ लोगों को गोली मारकर हत्या करने के बाद बुंदेलखंड (पाठा) के जंगलों में कूद गया था।
ददुआ क्षेत्र में 32 साल तक अपराध की दुनिया का आका बना रहा। बांदा, चित्रकूट, ललितपुर, फतेहपुर, जालौन, भिन्ड, मुरैना सहित राजस्थान और मध्यप्रदेश के कई जिलों में उसका आतंक रहा। जब मारा गया तो उसकी शिनाख्त करने वाला कोई नहीं था।
ठोकिया ने मारे थे एसटीएफ के छह जवान
ददुआ के मारे जाने के बाद ठोकिया ने एसटीएफ के आधा दर्जन जवानों को मार दिया था। इसके बाद एसटीएफ ने बदला लेने की कसम खाई थी। सरकार ने भी ठोकिया पर इनाम बढ़ा कर तीन लाख से पांच लाख कर दिया था। बाद में एसटीएफ ने ठोकिया को मुठभेड़ में मार गिराया था।