बुलंदशहर गैंगरेप कांड में सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी के बाद नगर विकास एवं संसदीय कार्यमंत्री आजम खां न्याय विभाग और नौकरशाहों से बेहद नाराज हैं।
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उन्होंने प्रमुख सचिव न्याय पर जान-बूझकर शीर्ष अदालत में उन्हें लज्जित करने का आरोप लगाते हुए कहा, न्याय विभाग मुझे सरकार का अंग नहीं मानता है। नौकरशाहों का अंधा, गूंगा व बहरा हो जाना मेरे खिलाफ सुनियोजित षड्यंत्र नहीं तो और क्या है? आजम ने सरकारी वकील से इस मामले की पैरवी कराने से इन्कार कर दिया है।
बुलंदशहर गैंगरेप कांड को ‘राजनीतिक षड्यंत्र’ बताने वाले आजम की ओर से 27 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में कोई वकील पेश नहीं हुआ था। प्रदेश सरकार की ओर से कहा गया कि उन्हें नोटिस तामील नहीं कराया गया है।
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इस पर शीर्ष अदालत ने नाराजगी जताते हुए सीबीआई को निजी तौर पर नोटिस तामील कराने के निर्देश दिए थे। अदालत की टिप्पणी के बाद आजम खां ने शुक्रवार को प्रमुख सचिव न्याय को कड़ा पत्र लिखकर अपनी नाराजगी का इजहार किया।
आजम ने ये लिखा पत्र में
उन्होंने कहा, 29 सितंबर को मेरे सामने विशेष सचिव गोपन का पत्र और एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड का सुप्रीम कोर्ट को संबोधित पत्र अवलोकनार्थ प्रस्तुत किया गया है। निश्चित रूप से एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड का पत्र उनके (प्रमुख सचिव न्याय) अनुमोदन से जारी किया गया होगा।
‘प्रभावी पैरवी’ पर हैरत और अफसोस जताया
आजम ने प्रमुख सचिव न्याय से कहा, ‘इस पत्र में अंकित दो शब्दों ‘प्रभावी पैरवी’ पर मुझे इंतेहाई हैरत भी हुई और अफसोस भी। इस ‘प्रभावी पैरवी’ का अर्थ मैं नहीं समझ पा रहा हूं। आपके द्वारा जान-बूझकर जिस तरह मुझे राष्ट्र की शीर्ष अदालत के सामने लज्जित करने की कार्यवाही की गई, उसके बाद अब ‘प्रभावी पैरवी’ का मैं क्या अर्थ लूं’।
न्याय विभाग की मानसिकता पर उठाए सवाल
प्रमुख सचिव न्याय को लिखे पत्र में आजम ने कहा, जो कार्यवाही आपके स्तर से बहुत पहले हो जानी चाहिए थी और जिसकी सूचना आपको मुझे लाजिमी तौर पर देनी थी, ऐसी कार्यवाही का तब अमल में लाया जाना जबकि आप साबित कर चुके हैं कि प्रदेश सरकार का न्याय विभाग मुझे सरकार का हिस्सा ही नहीं मानता, आखिर किस मानसिकता को इंगित करता है?
इसके अतिरिक्त और क्या वजह हो सकती है कि 27 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में मौजूद प्रदेश सरकार का पक्ष रखने वाले अधिवक्ता ने स्पष्ट रूप से कहा है कि वे मेरी तरफ से कुछ भी कहने के लिए अधिकृत नहीं थे।
प्रतिष्ठा को आघात के बाद कौन सी पैरवी
आजम ने प्रमुख सचिव से पूछा है कि मीडिया के माध्यम से पूरे देश में मेरी निजी प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुंचाने और इस बात का सुबूत देने के बाद कि मैं कहीं से भी सरकार का अंग नहीं हूं, मेरे पक्ष में न्याय विभाग अब कौन सी ‘प्रभावी पैरवी’ कराना चाहता है?
जिस बयान को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मुझे वादी बनाया गया और अदालत ने मुझे नोटिस जारी किया, गृह विभाग के अतिरिक्त इसकी जानकारी आपको भी अवश्य रही होगी।
ब्यूरोक्रेट्स पर तीखा वार
आजम ने कहा, मेरे विभाग के सचिव ने आपसे कई बार फोन पर वार्ता की लेकिन इस सबके बावजूद राज्य सरकार के नौकरशाहों का अभूतपूर्व रूप से अंधा, गूंगा और बहरा हो जाना मेरे विरुद्ध एक सुनियोजित षड्यंत्र के अतिरिक्त और क्या हो सकता है।
आजम ने प्रमुख सचिव पर व्यंग्य करते हुए कहा है कि मेरे लिए चिंतित होकर या दया का पात्र समझकर आपने मुझ पर जो कृपा की है, सुप्रीम में एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड एमआर शमशाद को ‘प्रभावी पैरवी’ के लिए लगाया है, उसके लिए मैं आपको हृदय से धन्यवाद देता हूं।
मैं भले ही अपने लिए ‘प्रभावी पैरवी’ करा पाने में सक्षम न हो पाऊं, फिर भी किसी हद तक केवल पैरवी के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने मेरी ओर से सुप्रीम कोर्ट में पैरवी करने की सहमति दे दी है। मुझ पर किसी प्रकार की दया न करें तथा अधिवक्ता एमआर शमशाद को मेरे पक्ष में आबद्ध किए जाने का आदेश वापस ले लें।
दी सफाई, पीड़ित परिवार को ठेस पहुंचाने की मंशा नहीं थी
आजम ने पत्र में यह भी सफाई दी है कि बुलंदशहर गैंगरेप की तथाकथित घटना को लेकर मैंने जो कुछ भी कहा था, उसके पीछे पीड़ित परिवार को रंच मात्र भी ठेस पहुंचाने की मेरी मंशा नहीं थी।
सरकार का वरिष्ठतम मंत्री होने के नाते मैंने अपनी यह जिम्मेदारी समझी थी कि एक दुखद और शर्मनाक घटना के सभी पहलुओं पर गहराई से जांच हो सके, इसके लिए अधिकारियों को कोई सार्थक संदेश दे सकूं ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न होने पाएं।