राज्य सरकार का तीन साल का कार्यकाल इस तरह के ढेरों उदाहरणों से भरा पड़ा है। जब आजम रूठे तो पूरी सरकार उनके दर पर पहुंच गई। किसी मामले में पहले थोड़ी ना-नुकर की भी, लेकिन बाद में कदम पीछे खींच लिए। कभी-कभी तो यह भ्रम भी पैदा होने लगा कि सूबे में सरकार किसकी चल रही है, ‘अखिलेश यादव की या आजम खां की।’
विज्ञापन
मार्च में अखिलेश सरकार ने सत्ता संभाली और जुलाई में आजम के गुस्से ने सरकार को अपना फैसला वापस लेने पर मजबूर कर दिया। दरअसल मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने आजम से मेरठ का प्रभार ले लिया। आजम का गुस्सा आसमान में पहुंच गया।
भेज दिया खत मुख्यमंत्री के नाम, ‘अगर मैं एक जिला नहीं संभाल सकता तो गाजियाबाद व मुजफ्फरनगर का काम कैसे संभालूंगा। प्रदेश कैसे संभालूंगा। अच्छा होगा हमें मंत्रिमंडल से भी हटा दिया जाए’। सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने मामला संभाला। आजम से बात की। सरकार ने अपना फैसला पलटा। तब माने आजम।
विज्ञापन
मुलायम और अखिलेश पर भी साधते रहते हैं निशाना
सरकार बनने के कुछ ही दिन बाद मुख्यमंत्री आवास पर रोजा इफ्तार हुआ। आजम लखनऊ में मौजूद होते हुए भी उसमें नहीं गए। मीडिया ने पूछा तो बोले, इबादत अकेले में होती है। पर, न जाने का कारण था इसकी मेजबानी स्वास्थ्य मंत्री अहमद हसन को सौंपने से नाराजगी। पर, सरकार की क्या मजाल जो आजम से कुछ कहे।
अमेरिका में जांच के लिए आजम को रोका गया तो ऐसा गुस्सा आया कि हमलावर हो उठे। ऐसे रूठे कि पूरा कार्यक्रम ही उनकी मान-मनौव्वल की भेंट चढ़ गया। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की काफी किरकिरी हुई। सपा मुखिया और मुख्यमंत्री ने 84 कोसी परिक्रमा के सिलसिले में विहिप के संरक्षक अशोक सिंहल सहित कुछ लोगों से मुलाकात कर ली तो आजम भड़क उठे।
कहा, ‘जो लोग बाबरी मस्जिद की शहादत के दोषी हैं, उनसे मुलाकात करने का क्या औचित्य।’ सरकार इस कदर आजम के दबाव में आई कि आनन-फानन में अयोध्या की 84 कोसी परिक्रमा पर अपना रुख बदलते हुए प्रतिबंध लगा दिया। विहिप नेताओं की गिरफ्तारी शुरू करा दी।
आजम रूठे तो ऐसे हिली सरकार
नवंबर 2013 में गाजियाबाद में हज हाउस के लिए धन देने से पहले वित्त विभाग ने कुछ जानकारियां मांग लीं तो आजम ऐसे रूठे कि सरकार ही हिल गई। उन्होंने तत्कालीन मुख्य सचिव जावेद उस्मानी को पत्र लिख दिया कि राज्य हज कमेटी अब हज हाउस बनाने की इच्छुक नहीं है। अच्छा होगा कि सरकार हज हाउस की इमारत को जमीन सहित किसी अन्य काम में ले ले। आनन-फानन में पूरा पैसा दे दिया गया।
आजम नाराज हुए तो कैबिनेट की लगातार आठ बैठकों में नहीं गए। संसदीय कार्यमंत्री होने के बावजूद कार्यमंत्रणा समिति की बैठक भी छोड़ दी। मान-मनौव्वल हुई।
विधान परिषद चुनाव में बुखारी के दामाद उमर को उम्मीदवार बनाने पर वे सपा मुखिया पर तंज कसने से नहीं चूके, ‘जो व्यक्ति 80 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले क्षेत्र से चुनाव नहीं जीत सका, उसको परिषद का प्रत्याशी बनाने का क्या औचित्य।’ आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल के निलंबन प्रकरण में ‘राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट’ कहकर अपनी ही सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया। इसी के कुछ दिन बाद दुर्गाशक्ति बहाल कर दी गईं।
आजम ने राज्यपाल पर भी बोला हमला
जौहर विश्वविद्यालय को लेकर आजम ने तत्कालीन राज्यपाल बीएल जोशी पर हमला बोल दिया। कहा कि इस विधेयक पर राज्यपाल पुनर्विचार नहीं कर सकते तो उसे विधानसभा को वापस कर दें।’ आजम के बयान से उत्पन्न तनाव को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने राज्यपाल बीएल जोशी से मिलकर शांत कराया। पर, आजम तो आजम ही हैं।
जोशी के बाद आए राम नाईक से भी आए दिन दो-दो हाथ कर रहे हैं। मुख्यमंत्री को राज्यपाल से मिलकर सफाई देनी पड़ रही है। पिछले दिनों राज्यपाल ने सरकारी भवन मौलाना जौहर अली शोध संस्थान के भवन को आजम की संस्था ‘मौलाना जौहर अली ट्रस्ट को’ देने के प्रस्ताव पर शिकायतें आने की बात कहते हुए सरकार को जांच का सुझाव दिया था।
सरकार ने जांच कराई या नहीं, यह तो वह जाने, पर भवन ट्रस्ट को सौंप दिया गया है। सरकार मुस्लिम वोट बैंक के चक्कर में शिया व सुन्नी किसी को नाराज नहीं करना चाहती थी, पर आजम ने अपना प्रभाव दिखाने के लिए शिया वक्फ बोर्ड के झगड़े में भी सरकार को ऐसा फंसाया कि मुख्यमंत्री व सपा मुखिया से कुछ करते ही नहीं बना। सिवाय आजम के इशारे पर चलने के।
फेसबुक पर आजम खां के नाम से फर्जी भड़काऊ पोस्ट करने वाले बरेली के कक्षा 11वीं के छात्र को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और परिवार की लाख सफाई के बावजूद उसे 14 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया।
पुलिस ने न्यायालय के उस निर्देश का भी ध्यान नहीं रखा जिसमें कहा जा चुका है कि नाबालिग को इस तरह गिरफ्तार करके जेल नहीं भेजा जा सकता। हालांकि यह छात्र गुरुवार को जमानत पर रिहा कर दिया गया, पर आजम की हनक तो दिख ही गई।
भले ही किसी अन्य आयोग के अध्यक्ष को कैबिनेट मंत्री का दर्जा न हो लेकिन आजम खां के दवाब में सरकार ने अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष को कैबिनेट मंत्री का दर्जा देने का फैसला किया। राज्यपाल ने मंजूरी नहीं दी, पर सरकार को रास्ता तो निकालना ही था। सो उसने आयोग के अध्यक्ष को राज्यमंत्री का दर्जा देने का प्रस्ताव कैबिनेट से पास करा लिया है।
भले ही पुलिस राजधानी में एटीएम बूथ से 51 लाख रुपये लूटने व तीन लोगों की हत्या करने वालों को नहीं ढूंढ पाती हो, ढूंढने पर मामला अगर आजम का हो तो पूरा सरकारी तंत्र गजब की तेजी से काम करता नजर आता है।
कुछ ही महीने पहले आजम की सात भैंसें चोरी क्या हो गईं, पूरे रामपुर के लिए संकट खड़ा हो गया। तत्कालीन पुलिस अधीक्षक साधना गोस्वामी ने अपने नेतृत्व में ही जांच टोली गठित कर डाली। ढिलाई बरतने वाले तीन पुलिस कर्मचारी लाइन हाजिर कर दिए गए।