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सद्भाव की अयोध्या : खातून सूफी संत बड़ी बुआ ने जगाई महिला सम्मान की अलख

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अयोध्या Published by: Amulya Rastogi Updated Wed, 30 Oct 2019 04:21 PM IST
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बड़ी बुआ की मजार - फोटो : amar ujala

बड़ी बुआ के नाम से मशहूर सूफी संत खातून बड़ी बीबी की मजार आज भी हिंदू संत-महंत समेत उलेमा-इकराम की आस्था व विश्वास का केंद्र है। महिलाएं इन्हें अपनी आन-बान-शान मानती हैं तो आने वाले हर धर्म के पुरुष ज्ञान-समर्पण व समृद्धि का द्योतक। 

कहते हैं कि 12वीं सदी में नगर कोतवाल ने उलमाओं को मिलाकर इनसे शादी का प्रस्ताव किया था, जिसे उन्होंने सादगी से खारिज कर दिया। मगर, जब जबरदस्ती की नौबत आई तो कोतवाल से पूछा, मेरी सबसे खूबसूरत चीज क्या है? जवाब मिला आंखें। कहते हैं कि तत्काल बड़ी बीबी ने अपनी दोनों आंखें निकालकर पत्ते पर रख दीं। साथ ही बद्दुआ दी कि अब यहां न कोई आलिम रहेगा न जालिम। लोग कहते हैं कि यहां की उदासी में आज भी इस बद्दुआ का असर कायम है।



अयोध्या के शीर्ष संतों समेत पीर-पैगंबरों की रुहानियत पर भक्त भगवंत चरितावली एवं चरितामृत नामक किताब लिखने वाले गोकुल भवन के महंत परमहंस राममंगल दास (1893-1984) बड़ी बुआ से बातें करते थे। उनकी मजार पर रात के सन्नाटे में आकर धूनी रमाते थे। 

वे लिखते हैं कि बड़ी बुआ जब पैदा हुईं तबसे गाय का दूध पिया, मां का दूध कभी नहीं पिया। बड़ी होने पर सुबह आठ बजे एक पाव व शाम 4 बजे एक पाव गाय का दूध पीकर ही पूरा जीवन काटा। आजीवन अविवाहित रहीं, राम व जानकी की अनन्य भक्त थीं। जीवनभर सफेद लिबास पहना और 126 वर्ष तक जिंदा रहीं।

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बड़ी बुआ की मजार - फोटो : amar ujala
बड़ी बुआ के नाम से मशहूर सूफी संत खातून बड़ी बीबी की मजार आज भी हिंदू संत-महंत समेत उलेमा-इकराम की आस्था व विश्वास का केंद्र है। महिलाएं इन्हें अपनी आन-बान-शान मानती हैं तो आने वाले हर धर्म के पुरुष ज्ञान-समर्पण व समृद्धि का द्योतक। 

कहते हैं कि 12वीं सदी में नगर कोतवाल ने उलमाओं को मिलाकर इनसे शादी का प्रस्ताव किया था, जिसे उन्होंने सादगी से खारिज कर दिया। मगर, जब जबरदस्ती की नौबत आई तो कोतवाल से पूछा, मेरी सबसे खूबसूरत चीज क्या है? जवाब मिला आंखें। कहते हैं कि तत्काल बड़ी बीबी ने अपनी दोनों आंखें निकालकर पत्ते पर रख दीं। साथ ही बद्दुआ दी कि अब यहां न कोई आलिम रहेगा न जालिम। लोग कहते हैं कि यहां की उदासी में आज भी इस बद्दुआ का असर कायम है।

अयोध्या के शीर्ष संतों समेत पीर-पैगंबरों की रुहानियत पर भक्त भगवंत चरितावली एवं चरितामृत नामक किताब लिखने वाले गोकुल भवन के महंत परमहंस राममंगल दास (1893-1984) बड़ी बुआ से बातें करते थे। उनकी मजार पर रात के सन्नाटे में आकर धूनी रमाते थे। 

वे लिखते हैं कि बड़ी बुआ जब पैदा हुईं तबसे गाय का दूध पिया, मां का दूध कभी नहीं पिया। बड़ी होने पर सुबह आठ बजे एक पाव व शाम 4 बजे एक पाव गाय का दूध पीकर ही पूरा जीवन काटा। आजीवन अविवाहित रहीं, राम व जानकी की अनन्य भक्त थीं। जीवनभर सफेद लिबास पहना और 126 वर्ष तक जिंदा रहीं।

रामनगरी की दक्षिणी सीमा पर घने जंगलों के बीच बड़ी बुआ की मजार अब जीर्ण-शीर्ण हो गई है, यहां सैकड़ों सिद्ध पीर-फकीरों की मजारें भी हैं। थोड़ी दूर पर भगवान राम कीकुल देवी बड़ी देवकाली माता का मंदिर है। मजार के तकियादार हाजी दिलावर अली कहते हैं कि बड़ी बुआ के नाम से मशहूर सूफ़ी संत ख़ातून बड़ी बीबी की यह कब्र है। यहां आसपास के हिंदू-मुसलमान ही नहीं सिख-ईसाई परिवार के लोग भी जियारत करने आते हैं। 

वे बताते हैं कि इनकी खूबसूरती पर फैजाबाद का शहर कोतवाल फिदा हो गया था। कोतवाल ने फैजाबाद के उलमाओं को आगे कर निकाह का पैग़ाम भेजा। बड़ी बुआ ने मना कर दिया। तब कोतवाल के दबाव में उलमाओं ने बड़ी बुआ के पास आकर कहा कि आप अल्लाह के हुक्म की तौहीन कर रही हैं, निकाह करना सुन्नते रसूल है। 

बड़ी बुआ ने जवाब दिया कि ठीक है, हम शादी कर लेंगे, लेकिन मेरी शर्त है कि ऐसे आदमी को ढूंढ कर लाओ जो मेरी तरह करामात करके दिखलाए, अंतत: उलेमा वापस हो गये। तब कोतवाल ने उन्हें बुलावा भेजा, मगर कहीं जाने से उन्होंने मना कर दिया। अगले दिन कोतवाल खुद आया और मिन्नत की कि हम आपके आशिक हैं, निकाह करना चाहते हैं। 

सूफी संत बड़ी बुआ ने कहा कि तुम्हारी आरजू पूरी होगी लेकिन, ये बताओ हमारे शरीर में तुम्हें क्या पसंद है। कोतवाल ने जवाब दिया- आपकी आंखें, बड़ी बुआ ने तत्काल अपनी दोनों आंखें निकालकर पत्ते पर रख दीं। कहा- तुझे जो चीज पसंद है वो हाजिर है, मगर याद रखना कि फ़ैजाबाद में अब ना कोई आलिम रहेगा ना जालिम। 

कहते हैं उसी के बाद से फ़ैजाबाद उजड़ना शुरू हो गया। नवाब शुजाउद्दौला ने फैजाबाद को बसाया, मगर अगले नवाब आसफ़ुद्दौला ने फ़ैजाबाद की जगह लखनऊ को अपनी राजधानी बना लिया। वे कहते हैं कि अब अयोध्या का फैसला आ जाए तो इस शहर की किस्मत चमक जाएगी।  

खादिम साजिद अली कहते हैं कि यहां नबी शीश पैगंबर समेत तमाम शीर्ष पीर-फकीरों की मजार है, मगर तनावपूर्ण माहौल से देश-विदेश से अकीदतमंद नहीं आ पाते, इसी कारण यहां की तरक्की नहीं हुई। मंगलवार को मन्नतें मांगने आए देवकाली क्षेत्र के पवन वर्मा कहते हैं कि यहां सुबह आने के बाद ही काम पर जाते हैं। बहुत सुकून मिलता है।

औलिया के शिष्य चिराग देहलवी थे बड़ी बुआ के छोटे भाई
-बड़ी बुआ के छोटे भाई सूफी संत नसीरुद्दीन महमूद (1274-1356) चिराग देहलवी के नाम से देश से बड़े सूफी संतों में शुमार हैं। इनके उत्तराधिकारी ख्वाजा कमालुद्दीन अल्लामा चिश्ती बंदा नवाज गेसू दराज हुए। देहलवी को रोशन चिराग-ए-दिल्ली खिताब दिया गया था। जिसका अर्थ है दिल्ली का प्रबुद्ध चिराग। वे ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया के शिष्य थे।
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