घर में भगवान राम-सीता और हनुमान की पूजा और श्वेताबंर मंदिर में आदिनाथ ऋषभदेव समेत सभी तीर्थंकरों की आरती करती हैं बेटियां। धर्म से हिंदू हैं, जैनधर्म के विधि-विधान से मंत्र-संकल्प, आरती पढ़ते देख हर कोई चकित रह जाता है। यह दृष्य है श्रीरामजन्मभूमि परिसर के पीछे स्थित आलमगंज कटरा के भव्य श्वेतांबर मंदिर का। तीर्थंकरों की दिन-रात आरती-पूजा का काम आस-पास के घरों की बेटियां संभालती है।
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अयोध्या और फैजाबाद मिलाकर जैनधर्म से जुड़े गिने-चुने कुल पांच घर हैं। हालांकि पांचों तीर्थंकरों के साल में होने वाले विभिन्न कल्याणक कार्यक्रमों में देश-विदेश के बड़े उद्योगपति समूह के परिवार समेत अनुयायियों का जमावड़ा यहां के अर्थतंत्र को हमेशा ऊंचाई देता है। यहां इन तीर्थंकरों के जीवन से संबंधित 18 कल्याणक भी घटित हुए हैं। यहां देश-विदेश से जैन समुदाय के लोग आते-जाते हैं।
अवध विश्वविद्यालय के इतिहास व पुरातत्व विभाग के प्रो. अजय प्रताप सिंह कहते है कि त्रेतायुग की रामायणकालीन अयोध्या नगरी सर्वधर्म समभाव का सबसे बड़ा केंद्र है। मुसलमान यहां पैगंबरों व शीर्ष सूफी संतों की मजारें होने को खुर्द मक्का मानते हैं। जबकि जैन धर्म के सभी 24 तीर्थंकर भगवान राम के वंशज हैं।
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आदिनाथ ऋषभ देव समेत पांच तीर्थंकरों की जन्मस्थली होने का अयोध्या को गौरव भी प्राप्त है। सिख समुदाय के पहले गुरु नानकदेव, 9वें गुरु तेग बहादुर और 10वें गुरु गोविंद सिंह ने यहां गुरद्वारा ब्रह्मकुंड में ध्यान किया था। पौराणिक कथा के मुताबिक इसी जगह भगवान ब्रह्मा ने 5000 वर्ष तक तपस्या की थी।
जैन धर्म पर शोध करने वाले संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ रामानंद शुक्ल कहते हैं कि जैन धर्म के दो पीठ दिगंबर व श्वेताबंर यहां है। रायगंज में दिगंबर जैन मंदिर प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव को समर्पित है, जिन्हें आदिनाथ, पुरदेव, वृषभदेव व आदिब्रह्म आदि नामों से भी जाना जाता है। जहां 31 फिट ऊंची उनकी प्रतिमा है।
गणनी प्रमुख ज्ञानमती संचालन करती हैं। है, जगह-जगह रामनगरी में कुल पांच मंदिर हैं। कल्याणक आयोजनों में देश-विदेश से जैन समाज के लोग आते हैं, यहां वैसे अयोध्या-फैजाबाद मिलाकर कुल पांच घर ही जैनियों के हैं। असली भक्त पदयात्रा करके आते हैं, वाहन से आना निषेध होता है।
श्रीरामजन्मभूमि के पीछे आलमगंज कटरा मोहल्ला में जैन श्वेतांबर मंदिर है। यहां प्रबंधक की पत्नी उगम जैन संचालन देखती हैं। कहती हैं कि जैन समाज नहीं है, इसलिए आसपास के घरों के हिंदू बेटियों को पूजा-आरती पद्धति सिखाई है। यहां के माहौल में तनाव से जैन लोग बसने से कतराते हैं। अयोध्या फैसला आ जाए तो सुख-शांति हो जाएगी। तमाम उद्योगपति यहां नया शहर बनाकर लोगों को बसाएंगे।
आरती कर रहीं आलमगंज कटरा की दीक्षा, लक्ष्मीदेवी, श्वेता, मानसी कहती हैं कि वे घर में भगवान राम व हनुमान जी की नित्य पूजा आरती करने के साथ यहां आकर तीर्थंकरों की आरती-पूजा विधिवत करती हैं। आखिरकार यह धर्म अयोध्या से ही है, सभी तीर्थंकर इक्ष्वाकु वंश से हैं, जो श्रीराम के पूर्वज हैं। यहां के मुसलमान भी भगवान राम को इमाम-ए-हिंद मानते हैं। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ जाए तो शहर दुनिया का सबसे धनवान और सुंदर शहरों में एक होगा।
जैन धर्म के सभी 24 तीर्थंकरों का जन्म भगवान श्रीराम के इक्ष्वाकु वंश से माना जाता है। इसमें पांच तीर्थंकर का जन्म अयोध्या में हुआ था।
प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के पिता के नाम नाभिराजा व माता का नाम मरूदेवी था। इनका जन्म चैत्रबदी आठ और मृत्यु माघ बदी 13 को हुआ था।
दूसरे तीर्थंकर अजितनाथ का जन्म माघ शुदी आठ को हुआ था। उनके पिता का नाम जितशत्रु व माता का नाम विजया था। उनकी मृत्यु चैत्र शुदी पांच को सम्मेेतशिखर में हुई थी।
चौथे तीर्थंकर अभिनंदन स्वामी का जन्म अयोध्या में माघ शुदी दो को और मृत्यु वैशाख शुदी आठ को सम्मेतशिखर में हुई थी।
पांचवे तीर्थंकर सुमतिनाथ का जन्म अयोध्या में वैशाखसुदी आठ को और मृत्यु सम्मेतशिखर में चैत्रसुदी नौ को हुई थी।
14वें तीर्थंकर अनंतनाथ का जन्म अयोध्या में वैशाख बदी 13 व मृत्यु सम्मेतशिखर में चैत्र शुदी 5 को हुई थी।
तीर्थंकरों की इन तिथियों पर कार्यक्रम आयोजित होते हैं।