लखनऊ। कोरोना काल में ऑटिज्म से पीड़ित बच्चों का इलाज मुश्किल हो गया है। करीब दो माह से रूटीन थेरेपी बंद होने से इनका मर्ज बढ़ता जा रहा है। परिजन चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन सभी सरकारी केंद्र बंद पडे़ हैं। ऐसे में वे निजी सेंटर जाने के लिए मजबूर हैं। वहीं, विशेषज्ञों के अनुसार ऑटिज्म में चार से पांच साल तक थेरेपी चलती है। इसके बाद बच्चों के व्यवहार व बोलने में बदलाव आता है। ऐसे में इलाज बंद होने का बच्चों का असर पड़ता है।
शहर में ऑटिज्म से ग्रस्त करीब एक हजार से अधिक बच्चों का इलाज चल रहा है। केजीएमयू, लोहिया संस्थान व पीजीआई में अभी इस केंद्र की शुरुआत हुई है। इन केंद्रों पर रोजाना करीब डेढ़ सौ बच्चे इलाज के लिए पहुंचते थे, जहां मुफ्त इलाज होता है। कोरोना के चलते मार्च के अंत में सभी केंद्र बंद कर दिए गए। इससे बच्चों की स्पीच, आक्यूपेशनल और बिहेवियर थेरेपी भी बंद हो गई है। ऐसे में परेशान परिजन निजी सेंटर पहुंच रहे हैं। ये एक माह तक की थेरेपी के आठ से दस हजार रुपये ले रहे हैं। ऐसे में गरीब परिवार सरकारी केंद्र खुलने का इंतजार कर रहे हैं। केजीएमयू की डॉ. नलिनी रस्तोगी के मुताबिक रेपी बंद होने से ऑटिज्म से पीड़ित बच्चों की सेहत पर खराब असर पड़ता है। इससे उनके व्यवहार में बदलाव आने लगता है। कोरोना काल में कई बच्चे यह परेशानी झेल रहे हैं।
76 बच्चों को मुफ्त स्पीच थेरेपी दे रही निजी संस्था
कोरोना काल में गोमतीनगर निवासी डॉ. ज्योत्सना एक निजी संस्था के माध्यम से जिले व बाहर के 76 आटिज्म पीड़ित बच्चों को मुफ्त में ऑनलाइन स्पीच थेरेपी करवा रही है। बताया कि जो परिवार अपने बच्चों का निजी सेंटर में इलाज करवाने में अक्षम हैं, उनके बच्चों को पूरे कोरोना काल में ऑनलाइन थेरेपी दी गई।
आटिज्म को समझें
ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिस्ऑर्डर एक दिमागी बीमारी है। इसमें बच्चा न तो अपनी बात ठीक से कह पाता है और न ही दूसरों की समझ पाता है। वह किसी से संवाद भी स्थापित नहीं कर पाता है। यह एक डवलपमेंटल डिसेबिलिटी है। इसके लक्षण बचपन से नजर आ जाते हैं।