पीजीआई में बना अस्थायी रैन बसेरा।
लखनऊ। एसजीपीजीआई के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में अंदर मरीज बीमारी से जंग लड़ रहे हैं, वहीं बाहर उनके परिजन भीषण गर्मी और अव्यवस्थाओं से जूझ रहे हैं। करोड़ों रुपये का सालाना बजट पाने वाले इस प्रतिष्ठित सरकारी संस्थान में तीमारदारों के लिए बुनियादी सुविधाओं का भारी अकाल है।
ट्रॉमा सेंटर परिसर में तीमारदारों के ठहरने के लिए एक भी स्थायी रैन बसेरा नहीं है। प्रशासन के बनाए गए दो अस्थायी रैन बसेरों की कुल क्षमता बमुश्किल 15 से 20 लोगों की है, जबकि यहां रोजाना सैकड़ों की संख्या में तीमारदार पहुंचते हैं। जगह की भारी कमी के कारण दर्जनों लोगों को मजबूरन खुले आसमान के नीचे या फुटपाथ पर रात गुजारनी पड़ रही है।
मुख्य गेट के पास नाली के ठीक बगल में टिनशेड डालकर पहला अस्थायी रैन बसेरा बनाया गया है। इसमें पंखा तक नहीं है। दिन में यह टिनशेड भट्टी की तरह तपती है और रात में उमस लोगों का जीना मुहाल कर देती है। वहीं, दूसरा रैन बसेरा मुख्य बिल्डिंग के पास कच्ची जमीन पर गंदगी के बीच बना है। तीमारदार यहां जमीन पर गत्ते बिछाकर लेटने के लिए मजबूर हैं। चारों तरफ फैली गंदगी और बदबू के कारण हर वक्त संक्रमण का खतरा बना रहता है।
तीमारदारों का कहना है कि अस्पताल परिसर में पीने के पानी, पंखे और सफाई जैसी न्यूनतम सुविधाएं तक नहीं मिलतीं। उन्होंने मांग की है कि तत्काल सर्वसुविधायुक्त स्थायी रैन बसेरा तैयार किया जाए, ताकि दूरदराज के लोगों को इस प्रताड़ना से मुक्ति मिल सके।
वहीं, पीजीआई निदेशक प्रो. आरके धीमन का कहना है कि ट्रॉमा सेंटर में कोई रैन बसेरा नहीं बना है। इसलिए पंखे लगवाने का कोई मतलब नहीं।