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पढ़िए, अटल को अजातशत्रु क्यों मानते थे विरोधी?

Thu, 25 Dec 2014 01:08 PM IST
राजेन्द्र सिंह/ अमर उजाला, लखनऊ
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पूर्व सांसद और फिल्म अभिनेता राज बब्बर कहते हैं कि वर्ष 1996 में मैं सपा से लखनऊ में अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ चुनाव लड़ा, लेकिन मेरे मन में इसको लेकर बड़ा द्वंद्व था। आखिरी वक्त में मैं चुनाव मैदान में उतरा। अटलजी नामांकन करने के बाद शाम की फ्लाइट से दिल्ली जा रहे थे।
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पर्चा भरने के लिए जरूरी डॉक्यूमेंट लाने मुझे भी दिल्ली जाना था। इत्तेफाक से मैं भी उसी फ्लाइट में चढ़ा। मेरी बाईं तरफ अटलजी बैठे थे। पीछे शिवकुमार थे। मैंने अटलजी के पैर छुए, उनके सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। वे मुस्करा रहे थे। मैंने कहा, ‘मुझे आशीर्वाद दीजिए।

बचपन में जिनके भाषण सुनने के लिए जाता था, उन्हीं के खिलाफ चुनाव लड़ना है। आशीर्वाद इसलिए मांग रहा हूं कि ईश्वर मुझे शक्ति दे कि मेरे मुंह से ऐसा कोई शब्द न निकले, जिससे उनकी शान में गुस्ताखी हो जाए’।
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पढ़िए, राजबब्बर से क्या कहा अटल जी ने

राजबब्बर आगे बताते हैं कि मुस्कराते हुए अटलजी ने कहा, ‘तुम्हारे अंदर संस्कार हैं। ऐसा कुछ नहीं होगा’। उन्होंने कम शब्दों में बड़ी बात कह दी। मैंने खूब प्रचार किया लेकिन अटलजी के खिलाफ एक भी शब्द नहीं बोला या कहूं कि इसकी हिम्मत ही नहीं पड़ी। वे 13 दिन के लिए प्रधानमंत्री बने।

इस दौरान एक बार मुलाकात हुई। प्रणाम किया, उन्होंने हाल-चाल पूछा तो मैंने कहा, आपका आशीर्वाद है। इसके बाद भी कई मौकों पर मिलना हुआ। संसद में जब कभी वे निकलते थे, हम लोग रास्ता छोड़कर किनारे हो जाते थे।

वे मुस्कराहट के साथ हल्की-फुल्की टिप्पणी करके निकल जाते थे। अटलजी को भारत रत्न देना सिर्फ पुरस्कार या सर्वोच्च सम्मान नहीं, एक संदेश भी है। संदेश यह कि किस तरह और कैसे संस्कारों के साथ राजनीति की जाती है। हमें अहसास रहना चाहिए कि उनकी राजनीति और संस्कार तिरोहित न होने पाएं।

'सीने में जलन, आखों में तूफान सा क्यों है'

फिल्म निर्माता एवं निर्देशक मुजफ्फर अली कहते हैं कि वर्ष 1998 में मैं अटलजी के खिलाफ लखनऊ से चुनाव लड़ा। उनकी याददाश्त देखिए, मैं उनसे मिला तो उन्होंने बाबरी मस्जिद गिराए जाने वाले वक्त की गई मेरी टिप्पणी को काफी सराहा।

उस समय मैंने कहा था,- ‘मैं दस फीसदी होकर नहीं रहना चाहता। यदि हमारे समर्थक, दोस्त और रिश्तेदार अलग हो जाएंगे तो हम केवल दस फीसदी रह जाएंगे’।

एक और मौके पर मुलाकात हुई तो उन्होंने मेरे चुनाव कंपेन की थीम को सराहा। मैंने अपने पोस्टरों पर अपनी फिल्म ‘गबन’ के एक शेर का इस्तेमाल किया था, ‘सीने में जलन, आंखों में तूफान सा क्यों है, इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है’।

अटलजी का सेंस और ह्यूमर बहुत अच्छा है। वे कवि हृदय हैं। उन्होंने कभी दिमाग में नहीं रखा कि मैं उनके खिलाफ चुनाव लड़ा था। यह उनका बड़प्पन है।

...और अटल ने की मेरी तारीफ

पूर्व मंत्री रहे भगवती सिंह का कहना है कि अटल बिहारी वाजपेयी देश के नेता हैं। उन्होंने हमेशा गरिमा का निर्वाह किया। लखनऊ में मैं उनके खिलाफ चुनाव लड़ा लेकिन कभी उनके खिलाफ व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं की। उन्होंने भी कभी व्यक्तिवादी कमेंट नहीं किया।

चुनाव के दौरान आमने-सामने पड़ने का मौका तो नहीं आया लेकिन एक बार वे हमारे महोना विधानसभा क्षेत्र के चंद्रिका देवी मंदिर में आए। उन्होंने मंदिर में हुए काम को देखा तो पूछा, किसने कराया है।
लोगों ने कहा, भगवती सिंह ने। उन्होंने खुले दिल से मेरी तारीफ की। अपनी पार्टी के नेताओं से कहा, ‘जो काम हमें कराने चाहिए, वे भगवती सिंह करा रहे हैं। उनसे कुछ सीखिए’।

विधान परिषद सदस्य मधु गुप्ता कहती हैं कि अटलजी के खिलाफ मैं 2004 में सपा प्रत्याशी के रूप में लखनऊ से लोकसभा चुनाव लड़ी थी। वे सम्मानित नेता और भारतीय राजनीति के भीष्म पितामह हैं। पार्टी ने मुझे उनके खिलाफ चुनाव लड़ने की जिम्मेदारी सौंपी थी। मैं हिम्मत के साथ चुनाव लड़ी।

अटलजी का चुनाव उनके कार्यकर्ता लड़ रहे थे, इसलिए उनसे सीधी मुलाकात नहीं हुई। हां, उनके पिछले चुनावों के बारे में सुना जरूर है। वे संवेदनशील और विनोदी स्वभाव के हैं। विरोधी भी उनका सम्मान करते हैं।
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पद और कद ही नहीं, दिल भी बड़ा

पूर्व एमएलसी व महापौर दाऊजी गुप्ता कहते हैं कि अटलजी अमीनाबाद में मारवाड़ी गली में अमीनाबाद में कलंत्रीजी के घर रहते थे। वे रबड़ी और मलाई के शौकीन हैं। शाम को हमलोग शंभू हलवाई की दुकान पर मलाई खाने जाते थे। पता नहीं, कितनी बार उनके साथ चाट खाई होगी।

उनके खिलाफ मैं लोकसभा का चुनाव लड़ा लेकिन राजनीतिक विचाराधारा संबंधों में कभी आड़े नहीं आई। देश हो या विदेश जहां भी मिले, नाम लेकर पुकारा, ‘दाऊजी कैसे हो।’ दिल्ली में सर्जन डॉ. विजय कुमार मेहता की पुस्तक के विमोचन समारोह में वे मुख्य अतिथि थे।

वे मंच पर पहुंचे तो सामने कुर्सियों पर मुझे बैठे देखा। वहीं से मेरा नाम लेकर पुकारा, ‘अरे भाई दाऊजी को यहां लाओ।’ वे सिर्फ पद व कद से ही बड़े नेता नहीं हैं, उनका दिल भी बड़ा है। उन्हें भारत रत्न दिए जाने से लखनऊ शहर का गौरव बढ़ा है।
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