डॉ. दाऊजी गुप्त कहते हैं, 'अमीनाबाद में बताशे वाली गली के पास शंभू हलवाई की रबड़ी, गणेशगंज के नौबत हलवाई की जलेबी और गणेशगंज के ही रामनारायण तिवारी की चाट का स्वाद हम लोगों की जुबान पर ऐसा चढ़ा कि बिना खाए हम लोगों का खाना ही हजम नहीं होता था।'
डॉ. गुप्ता बताते हैं, 'एक दिन हम सभी लोग अटल जी के कमरे के बाहर बैठे इंतजार कर रहे थे। अटल जी काम कर रहे थे। हम लोग चुपचाप इंतजार कर रहे थे कि कब उनका काम खत्म हो और चाट खाई जाए। अचानक अंदर से अटल जी की आवाज आई, 'अब भाई बरदाश्त नहीं हो रहा है। तिवारी जी की चाट इंतजार कर रही होगी।'
कहां है इमरती और चाट
बकौल गुप्त, 'अटल जी बड़े पदों पर भी पहुंच गए लेकिन वह लखनऊ आने पर इन वस्तुओं का स्वाद लिए बिना नहीं रहे। वह विपक्ष के नेता थे। मैं एक दिन उनसे मिलने पहुंचा। शाम का वक्त था। मुझे जैसे ही देखा हाथ बढ़ाते हुए बोले, 'कहां है हमारी रबड़ी और चाट। बिना उसके कोई बात नहीं होगी।'