कौन जानता था कि आगरा के पास एक छोटे से गांव बटेश्वर के रहने वाले स्कूल मास्टर कृष्ण बिहारी वाजपेयी के घर 25 दिसंबर 1924 को पैदा हुआ छोटा सा बालक एक दिन राजनीतिक क्षितिज का ‘अटल’ और अमर नक्षत्र बन जाएगा।
मां कृष्णा देवी जी का लाडला देश का ऐसा नायक बन जाएगा जिसे लोग जननायक मानेंगे। जिसको सुनने व देखने की बेताबी न सिर्फ देश में बल्कि कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी रहेगी।
लोग उसे अटल बिहारी वाजपेयी के नाम से कम ‘अटल’ नाम से ही ज्यादा जानेंगे। वाजपेयी का नाम अटल कब और क्यों पड़ा। इस बारे में उनकी भतीजी करुणा शुक्ला ने कुछ वर्ष पहले लखनऊ में ‘अमर उजाला’ को बताया था, ‘चाचा बचपन से ही धुन के पक्के थे।
जो करने की ठान लेते उसे करके ही मानते। पर, जिद्दी नहीं थे। सबकी सुनते थे। फिर चर्चा करते थे। तर्कों से लोगों को अपनी बात मानने पर राजी करते थे। कहीं कुछ गलत होता था तो तुरंत उसमें सुधार भी कर लेते थे। शायद इसीलिए उनका नाम अटल बिहारी वाजपेयी रखा गया होगा।
जब पिता व पुत्र एक ही सहपाठी बने
यह शायद यमुना नदी के किनारे गांव होने का ही शायद प्रभाव रहा होगा कि अटल के जीवन की राह भी नदी की भांति हो गई।
पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी संस्कृत के बड़े विद्वान थे।
पेशे से शिक्षक कृष्ण बिहारी वाजपेयी की रचित प्रार्थना ग्वालियर के स्कूलों में पढ़ाई जाती थी।
उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा ग्वालियर में हुई। जहां उनके पिता पहले अध्यापक रहे और बाद में उन्हें स्कूलों का जिला निरीक्षक बनाकर पदोन्नति दी गई। अटल बी.ए. करने के उपरांत एम.ए. और कानून की पढ़ाई करने के लिए कानपुर आ गए।
यहां मजेदार बात यह रही कि उनके आने के बाद उनके पिता भी सेवानिवृत्त होने के बाद इसी स्कूल में कानून की पढ़ाई करने आ गए। एक ही कक्षा में होने के कारण अक्सर अजीबो-गरीब स्थिति खड़ी हो जाती।
पिता कक्षा में नहीं होते तो लोग अटल से पिता के बारे में पूछते। अटल नहीं होते तो उनके पिता से ऐसे ही सवाल होते। नतीजतन दोनों लोगों ने अपने सेक्शन (वर्ग) अलग-अलग करा लिए।
जानें क्यों नहीं की अटल ने शादी
पिता कृष्ण बिहारी की इच्छा तो यही थी कि बाकी छह भाई-बहनों की तरह अटल भी विवाह करके घर-गृहस्थी बसाएं।
पर, यह शायद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आने का ही असर था उन्होंने पिता से विनम्रतापूर्वक विवाह से इन्कार कर दिया।
अटल न सिर्फ बचपन से कविताओं के मंच पर कवि के रूप में शामिल होने लगे थे बल्कि वह ग्वालियर की आर्य कुमार सभा से भी जुड़ चुके थे।
अटल की बुद्धि इतनी तीक्ष्ण थी कि जो पढ़ते वह उन्हें पूरा का पूरा याद ही नहीं हो जाता बल्कि उसका विश्लेषण करने में भी उन्हें समय नहीं लगता।
शायद इसी खूबी के कारण उन्हें आर्य सभा के साप्ताहिक सत्संग में बोलने का मौका भी दिया जाने लगा। इसी दौरान उनका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संपर्क हुआ। संघ के कामधाम की शैली उनके दिल में कुछ ऐसी बसी कि वह यहीं के होकर रह गए।
शुरू हुई चुनावी राजनीति
आगे चलकर संघ को जब राजनीतिक दल के गठन की जरूरत महसूस हुई तो फिर दीनदयाल उपाध्याय के साथ अटल बिहारी वाजपेयी की याद आई।
कारण, अटल सिर्फ अच्छे साहित्कार व पत्रकार ही नहीं थे बल्कि एक अच्छे वक्ता के रूप में भी अपनी पहचान बना चुके थे। वह 1957 में जनसंघ के टिकट पर प्रदेश के तीन स्थानों लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से चुनाव लड़े।
लखनऊ और मथुरा से तो वह चुनाव हार गए। पर, बलरामपुर से लोकसभा में पहुंच गए। उन्होंने 1962 में लखनऊ से फिर किस्मत आजमाई लेकिन सफलता नहीं मिली। फिर वह 1991 में फिर लखनऊ लडऩे आए।
तब तक जनसंघ, भाजपा में तब्दील हो चुका था। वह चुनाव जीते और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बने। इसके बाद वह यहीं के होकर रह गए। वह 2004 तक लगातार यहीं से लोकसभा का चुनाव लड़े और जीते।
स्वास्थ्य कारणों से उन्होंने 2009 का चुनाव नहीं लड़ा। उनकी जगह लालजी टंडन चुनाव लड़े। लखनऊ से सांसद के रूप में वह पहले 13 दिन फिर 13 महीने और बाद में पांच साल प्रधानमंत्री रहे।