अस्थिकलश के साथ राजनाथ सिंह
चांदी के कलश में प्रतीकों के रूप में अटल को लेकर केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित पूरी सरकार जब उन्हें उस गोमा की गोद में हमेशा-हमेशा के लिए सौंपने चली जिसे जीवित रहते अटल अपनी मां कहते थे। लखनऊ की जीवनदायिनी बताते हुए उसकी सफाई की बात उठाया करते थे।
चेताते थे कि मां गोमती न रही तो हम भी नहीं रहेंगे तो राजधानी की सड़कें पूरी तरह अटल मय हो गई। जीवन भर लखनऊ पर फिदा रहे अटल पर आज लखनऊ फिदा हुआ दिख रहा था। ऐसा लगा कि स्थूल से सूक्ष्म स्वरूप धारण कर चुके अटल लोगों के दिल व दिमाग में अब स्थूल रूप से साकार हो उठे हों। सिर्फ उनके नहीं जिन्होंने अटल को देखा या सुना है बल्कि उन 17-18 साल के किशोरों के भी जो सिर्फ अटल के बारे में सुना ही है।
अटल का कलश जब भाजपा मुख्यालय के सामने से गुजरा तो लगा कि बस अब यह आवाज गूंजने ही वाली है, ‘महराज! कैसा चल रहा है।’ बेगमहजरत महल पार्क के सामने यात्रा पहुंची तो लगा, ‘बस अब माइक पर अटल की यह आवाज गूंजने ही वाली है, ‘मेरे प्यारे लखनऊ के लोगों!’ पर, इस बार काफिला बेगम हजरतमहल पार्क पर नहीं रुका और न वह उस चौक की तरफ बढ़ा जहां अटल ने कई बार ठंडाई और लस्सी पी होगी।
यात्रा ने गोमती नदी पार किया तो अचानक आंखों में प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद निरालानगर में हुआ कार्यकर्ता सम्मेलन का नजारा घूम गया। जिसमें वह आए थे। जब कार्यकर्ताओं ने कहा था, ‘अटल जी! पार्टी में गणेश परिक्रमा को बढ़ावा देने वालों के कारण पार्टी हारी है। जो लोग मंच पर बैठे थे यही आपकी हार का कारण है।’ और इसी के बाद अटल रुके और बोले, ‘मैं रुक रहा हूं। कल सुबह एक-एक कार्यकर्ता से मिलूंगा। वह मिले भी और उसके बाद कई बदलाव भी हुए।’
लखनऊ में 2007 की सभा में जो उनकी अंतिम सभा साबित हुई अटल ने कहा था कि स्वस्थ हुआ तो गोमती की सफाई का काम पूरा करूंगा। पर, उनका यह सपना पूरा नहीं हो पाया। देखने वाली बात होगी जिस गोमती में अटल की अस्थियां व भस्म प्रवाहित की गई है, उसे पूरी तरह से निर्मल और अविरल बनाने का अटल का सपना कब पूरा होता है।