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'...तिल-तिल कर मरी हूं मैं। ...11 साल मैंने सजा काटी'

Thu, 14 Apr 2016 02:43 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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...तिल-तिल कर मरी हूं मैं। ...11 साल मैंने सजा काटी। मेरा बचपना कोई नहीं लौटा सकता...। 70 से 80 दफा कोर्ट में पेश हुई। बहुत कुछ खोया है मैंने...। हर पेशी एक टीस उभरती...। लगता कोई नासूर है। जख्म हरे हो जाते। पर आज खुश हूं। दिल को तसल्ली मिली... कि मेरे गुनहगार गौरव शुक्ला को अदालत ने गुनहगार करार दिया। हमने बहुत कुछ सहा...अब उसकी बारी है।
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ये शब्द हैं आशियाना कांड की पीड़िता के। इतना कहते उसकी आंखें डबडबा आईं। आंखों के कोर से ढलकने को हुए आंसू को झट पोंछने के लिए हाथ बढ़ गए।

नहीं मालूम था, हर पेशी पर उस घिनौने दिन की याद दिलाई जाएगी...
उन लोगों ने तो सिर्फ एक बार मेरे साथ दुराचार किया, लेकिन मुझे नहीं मालूम था कि न्याय की इस लड़ाई में हर बार मुझे उस घिनौने दिन की याद दिलाई जाती रहेगी। जब खुलेआम, बार-बार मुझसे ‘उस दिन’ के बारे में सवाल पूछे जाते और बलात्कारी की पहचान को लेकर सवाल उठाए जाते तो मैं दहल जाती थी। मुझे लगता कि यहां तो सबके सामने मेरा बलात्कार हो रहा है।

नारी निकेतन से छूटी तो सवालिया नजरों से घूरते रहे लोग

कोर्ट का फैसला आने के बाद खुशी मनाती पीड़िता
मेरा कोई कुसूर नहीं था। फिर भी मुझे 15 महीने तक नारी निकेतन में रहना पड़ा। वहां से आने के बाद, मुझे लगा कि जैसे कोई गुनहगार जेल से छूट कर आया हो। हर किसी की निगाहें मुझे सवालिया नजरों से देखती थीं।

मुझे मालूम है कि जो कुछ मेरे साथ गुजरा है, उसे भूलना भी चाहूं तो समाज उसे भूलने नहीं देगा। सिर्फ मां और पिता ने मेरा साथ दिया। उनके दिए हौसले का ही नतीजा है कि मैं आज सबके सामने अपनी बात रख पा रही हूं।

तब 13 साल की थी... मैंने तो सब कुछ खो दिया
खुश हूं कि अदालत ने आखिरकार उसे गुनहगार मान लिया। पर देश की न्याय व्यवस्था से मेरा सवाल है- क्यों लगती है इतनी देरी फैसला आने में? ऐसे मामलों में तो तुरंत फैसला देने की व्यवस्था होनी चाहिए। एक पीड़ित के लिए इतने लंबे समय तक कभी अदालत का कठघरा तो कभी बलात्कारी पक्ष का दबाव झेलना मुश्किल हो जाता है। जिस वक्त मेरे साथ घिनौनी वारदात हुई, मैं 13-14 साल की थी। आज 24 साल की हूं। क्या मिला मुझे? सिर्फ संघर्ष...। मैंने अपना सबकुछ खो दिया, किसी और के साथ ऐसा न हो, इसलिए न्यायिक प्रक्रिया में सुधार जरूरी है।
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...उसे पता चले कि सपनों के मरने पर कैसा लगता है

कोर्ट जाता आरोपी
मेरी अदालत से दरख्वास्त है कि उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाए। ताकि उसे भी तिल-तिल कर मरने का अहसास हो। जिस तरह घुट-घुट कर मैंने दिन काटे.... उसे भी तो एहसास हो कि सपनों के मरने पर कैसा लगता है।

खुश होना चाहती हूं...बेखौफ जीना चाहती हूं
(हल्के गुलाबी और बादामी रंग की पहनी साड़ी की ओर इशारा करते हुए) तीन साल पहले इसे खरीदा था। पर पहना नहीं। तय किया था कि जिस दिन फैसला आएगा, उस दिन खुशी मनाऊंगी। इस साड़ी को पहनूंगी। 11 साल हो गए खुश होकर हंसे हुए। आज मैं खुश होना चाहती हूं, हंसना चाहती हूं। अब बेखौफ हो जीना चाहती हूं।
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