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लखनऊ में हुई राख की बारिश, वैज्ञानिक हैरान!

Tue, 02 Dec 2014 02:35 PM IST
अभिषेक यादव/अमर उजाला, लखनऊ
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उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर में सोमवार को दिन भर आसमान से राख बरसती रही। लोग हैरान-परेशान होकर इसकी वजह तलाशते रहे। अधिकतर को संदेह रहा कि आसपास ही कोई कूड़ा जला रहा है, जिससे यह राख गिर रही है।
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पाठकों ने दिन भर अमर उजाला संवाददाताओं को फोन करके इन हालात की जानकारी दी, जिससे सामने आया कि राख की बारिश त्रिवेणीनगर से लेकर माल एवेन्यू तक के कई इलाकों में शाम तक होती रही।

विभिन्न क्षेत्रों के वैज्ञानिकों से चर्चा करके अमर उजाला ने राख की बारिश की हकीकत जानने की कोशिश की। शहर में करीब 8 किमी. लंबाई तक बरसे इस राख और 4-4 इंच के टुकड़ों के चलते नागरिक बार-बार घर-आंगन की सफाई में लगे रहे।
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इसका असर त्रिवेणीनगर से लेकर केजीएमयू, केडी सिंह बाबू स्टेडियम, कैसरबाग, हजरतगंज, गोमतीनगर के कई हिस्सों और माल एवेन्यू तक रहा।

ज्वालामुखी के फटने पर होती है इस तरह की घटना

जानकारों के अनुसार, आमतौर पर किसी ज्वालामुखी के फटने पर आसपास के क्षेत्रों में आसमान से राख गिरती रहती है और घातक नुकसान करती है, लेकिन लखनऊ के आसपास ऐसा कुछ नहीं है। एग्रीकल्चर वेस्ट यानी धान या गन्ने की कटाई के बाद निकले भूसे और अवशेष को जलाने और उसी दौरान तेज हवा बहने से उसके राख की वर्षा आसपास के क्षेत्रों में हो सकती है।

भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अजय साह के अनुसार, लखनऊ के निकटवर्ती सीतापुर, लखीमपुर, बाराबंकी में गन्ने का बहुतायत में उत्पादन हो रहा है। यह भी देखने में आया है कि कटाई के बाद किसान पतावर या उसकी पत्तियों को मौकों पर जला देते हैं। इसी तरह धान पुआल को भी जला दिया जाता है।

माना जाता है कि इससे खेत की मिट्टी को फायदा होगा, लेकिन असल में इससे मिट्टी का पोषण खत्म हो जाता है। इसके बजाय गन्ने की पत्तियों में कुछ यूरिया और पानी डालकर उससे खाद बनाई जा सकती है।

वैज्ञानिक संभावना जताते हैं कि लखनऊ में गिर रही राख खेतों में जलाए गए पतावर की हो सकती है। ये तेज हवा के साथ उड़कर आसमान पहुंच सकते हैं और हल्के होने से कई किलोमीटर दूर गिर सकते हैं। डॉ. साह बताते हैं कि एग्रीकल्चर वेस्ट जलाने पर रोक लगाने के लिए आईआईएसआर ने अभियान चलाया हुआ है।
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...और सात मील प्रति घंटे की रफ्तार से चली हवा

बीते कुछ दिनों के मुकाबले सोमवार को हवा कुछ तेज बह रही थी। दोपहर में हवा की रफ्तार करीब 7 मील प्रति घंटा रही और यह पश्चिम से ज्यादा समय चली। शाम ढलने के साथ ही इसकी गति साढ़े 3 मील रह गई और दिशा पश्चिम-उत्तर हो गई, तब राख का गिरना भी कम हो गया।

सेहत पर असर
इस राख को आर्सेनिक माना जाता है, जिसमें मर्करी, लेड और कई जहरीले हैवी मैटल हो सकते हैं। इनसे हृदय, फेफड़ों, किडनी आदि से जुड़ीं बीमारियां हो सकती हैं, तो बच्चों की हड्डियों की वृद्धि पर असर हो सकता है।

संभावना यह भी, लेकिन कमजोर
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के शोध समन्वय निदेशक डॉ. इरफान एच ने कहा कि फिलहाल कुछ समय से पृथ्वी पर अंतरिक्ष से लियोनिड शॉवर चल रहा है। इससे छोटे-छोटे उल्कापिंड पृथ्वी पर आते हैं और चूर-चूर होकर या जलकर सतह पर गिर रहे हैं। रात में यह जलती हुई लकीरों की तरह दिखते हैं।

हालांकि, लखनऊ में हो रही राख की बारिश लियोनिड शॉवर का ही हिस्सा है, इसे वे प्रमाणिक रूप से नहीं कह सकते। उन्होंने बताया कि इसके लिए राख के कणों के अध्ययन की जरूरत है।
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