वाश चित्रकला शैली के माहिर राजीव मिश्र एक बेहतरीन चित्रकार के साथ ही संगीत प्रेमी भी थे। वह नाल तथा बांसुरी भी बजाते थे। उनके चित्रों में भी संगीत प्रेम दिखता है। सोमवार शाम पीजीआई में उनका देहांत हो गया। राजधानी के कला प्रेमियों ने उनके निधन को बड़ी क्षति बताया।
64 वर्षीय राजीव मिश्र की बेटी स्तुति मिश्रा ने उन्हें तीन दिन पहले ही पीजीआई में भर्ती कराया था। वह काफी समय से अस्वस्थ चल रहे थे। मंगलवार को बैकुंठ धाम में उनका अंतिम संस्कार किया गया। स्तुति ने बताया कि पिता पिछले तीन माह से 15 फीट लंबी तस्वीर पर काम कर रहे थे।
वरिष्ठ चित्रकार व डॉ. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय में अध्यापक डॉ अवधेश मिश्र ने बताया कि राजीव मिश्र लखनऊ की बहुप्रचलित वाश चित्रकला शैली या कहें बंगाल से उद्भूत और लखनऊ में विकसित बंगाल कला शैली के पोषक बद्रीनाथ आर्य के प्रमुख शिष्यों में एक थे। जैसे बद्रीनाथ आर्य ने अपनी रचनात्मक यात्रा के अंतिम पड़ाव पर बंगाल शैली के विषयों, आकारों और रचना पद्धति से अलग अपनी एक शैली विकसित की थी जिसमें विखंडन और घरौंदा जैसी श्रृंखलाएं बनाई थीं, उसी तरह राजीव मिश्र ने भी पारंपरिक विषयों और पद्धति को छोड़कर विखंडित रूपों पर आधारित संयोजन बनाने शुरू किए थे। कुछ समय तक उन्होंने महिला आकृतियों को सुरीले वाद्य यंत्रों की तरह रचा था और पशु पक्षियों विशेषकर गायों के बीच में स्वयं को रखते हुए भी उनके बहुत से चित्र देखे गए थे। राजीव मिश्र समसामयिक विषयों और व्यक्तित्व को भी अपनी रचनाओं में स्थान देते थे। महान कवि, साहित्यकारों, कलाकारों इत्यादि के छवि चित्र बनाना, संगीत और नाटक जैसे आनुषंगिक कला विधाओं की प्रस्तुतियों में निरंतर उपस्थित रहना उनकी प्रकृति में था। चित्रकारी से मन बदलते हुए वह नाल और बांसुरी बजाते थे। वह वाश कला शैली के इतिहास में जिंदा रहेंगे।
कलाकार भूपेंद्र अस्थाना, राजीव नयन, अखिलेश निगम, अभय द्विवेदी, चित्रकार राजेंद्र प्रसाद आदि ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया।