मातृभूमि की रक्षा करते हुए सरहद पर अपने प्राण न्यौछावर करने वाले जांबाजों के संकट से घिरे परिवार को मदद पहुंचाने में शहरवासियों की कोई रुचि नहीं है।
कारगिल युद्घ के समय राष्ट्र की मदद के लिए अपने जेवर तक दान देने वाले शहरवासी सशस्त्र सेना झंडा दिवस के कोष में दान देने में उत्साह नहीं दिखा रहे हैं।
यही कारण है कि 38 लाख की आबादी वाले लखनऊ में सशस्त्र सेना झंडा दिवस के कोष में एक साल में केवल 4,77,210 रुपये ही जमा हो पाए। प्रति व्यक्ति औसतन 10 पैसे कोष में जमा हो सके हैं।
इतना ही नहीं शहर के एसएसपी सहित 95 सरकारी विभागों के अधिकारियों ने जिला सैनिक कल्याण व पुनर्वास कार्यालय को झंडे खरीदने के लिए तय 3.24 लाख रुपये भी जमा ही नहीं किए।
फिर होगी वही उम्मीद
सात दिसंबर को इस उम्मीद के साथ सशस्त्र सेना झंडा दिवस मनाया जाएगा कि शायद शहरवासी शहीदों के परिवार वालों की मदद के लिए आगे आएंगे। सशस्त्र सेना झंडा दिवस पर एकत्र धनराशि से कारगिल युद्घ से शहीदों, पूर्व सैनिकों व सरहदों पर तैनात सेवारत जवानों के आश्रितों की आर्थिक मदद की जाती है।
इसलिए मनाया जाता है सशस्त्र सेना झंडा दिवस
स्वतंत्रता से पहले अंग्रेज अपने राष्ट्र व उपनिवेश की रक्षा के लिए शहीद होने वाले सैनिकों की स्मृति में प्रत्येक वर्ष 11 नवंबर को पौपी डे के नाम से स्मृति दिवस मनाते थे। इस दिन एकत्र धनराशि को सेवारत व पूर्व सैनिकों के अलावा उनके आश्रितों के कल्याण के लिए उपयोग किया जाता था।
प्रथम विश्व युद्घ के बाद यह दिवस 11 नवंबर को ही आरमिसटिस-डे के नाम से मनाया जाने लगा। स्वतंत्रता के बाद हर साल सात दिसंबर को यह दिन झंडा दिवस के नाम से मनाया जाने लगा।
भारत में यह दिन शहीदों, सेवारत जवानों, पूर्व सैनिकों के आश्रितों की सहायता के लिए स्थापित निधि में आम जनता से योगदान प्राप्त करने के लिए मनाया जाता है।
एसएसपी नहीं आए, डिप्टी कलेक्ट्रेट ने झंडे लौटाए
सशस्त्र सेना झंडा दिवस पर शहीदों के सम्मान में जिस झंडे को लगाया जाता है, उसे डिप्टी कलेक्टर अलका वर्मा ने जिला सैनिक कल्याण व पुनर्वास कार्यालय को वापस कर दिया। कार्यालय का चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी अलका वर्मा को उनके कक्ष संख्या चार में एक लिफाफे में रखे 242 झंडे देने पहुंचा था।
अलका वर्मा ने झंडा लेने से इनकार ही नहीं किया, बल्कि अपने कर्मचारी को इसे फाड़कर फेंकने के आदेश दिया। इसके बाद जिला सैनिक कल्याण व पुनर्वास कार्यालय का कर्मचारी लिफाफा लेकर वापस आ गया।
वहीं, दूसरी ओर जिला सैनिक कल्याण अधिकारी कर्नल हृदय नारायण कौशल एसएसपी जे. रविंदर गौड को झंडा लगाने के लिए उनके कैम्प कार्यालय पहुंचा। सूचना पहुंचाने के बावजूद एसएसपी ने मिलने का समय नहीं दिया। इसके बाद जिला सैनिक कल्याण अधिकारी निराश होकर वापस लौट आए।