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पुरातत्व विभाग ने दफना दी नवाबों के दौर की 200 साल पुरानी नाव

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नीरज ‘अम्बुज’, लखनऊ। करीब दो साल पहले छतर मंजिल परिसर की खुदाई में मिली 200 साल पुरानी लकड़ी की नाव के संरक्षण के लिए जरूरी बजट न होने से पुरातत्व विभाग ने इसे दोबारा मिट्टी में दफना दिया। नाव को संरक्षित कर लिया जाता तो यह पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र होती।
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बात वर्ष 2019 की है। नवाबों के आशियाने छतर मंजिल की मरम्मत का काम राज्य पुरातत्व विभाग करा रहा था। इस दौरान खुदाई करते समय करीब 25 फीट की गहराई पर नवाबी काल की लकड़ी की नाव मिली। इस नाव का इस्तेमाल आने-जाने के लिए किया जाता था। यह नाव 50 फीट लंबी और 12 फीट चौड़ी थी। लकड़ी की यह नाव लंबे समय तक जमीन में दबी थी। इससे इसकी लकड़ी भुरभुरी हो गई और नाव के आगे व पीछे का हिस्सा टूटा हुआ था। पुरातत्वविदों ने इसका कारण गोमती नदी की लगातार बाढ़ की वजह से नाव पर जमा हुए सिल्ट को बताया था। ऐतिहासिक नाव मिलने से पुरातत्व विभाग उत्साहित था और इसे संरक्षित कर पर्यटकों को दिखाने की योजना बनाई। नाव के संरक्षण को लेकर राष्ट्रीय सांस्कृतिक संपदा संरक्षण एवं अनुसंधानशाला (एनआरएलसी) से विचार-विमर्श किया गया। एनआरएलसी ने नाव को रसायनों से संरक्षित करने पर करीब 30 लाख रुपये का खर्च बताया, लेकिन पुरातत्व विभाग के पास इतना बजट नहीं था। लिहाजा अधिकारियों ने इसे यह कहते हुए दोबारा दफन करवा दिया कि जल्द ही दोबारा निकलवाकर नाव संरक्षित की जाएगी।
छतर मंजिल के तहखाने से चलती थीं नावें
इतिहासविद हफीज किदवई ने बताया कि ऐतिहासिक धरोहर छतर मंजिल नवाबों का आशियाना था। यहां बने तहखानों से नावें चलती थीं। ये तहखाने सीधे गोमती नदी से मिले हुए थे। तहखानों में इन नावों को बांधने के लिए बड़े-बड़े कुंडे भी बने हैं। तहखानों से होेते हुए नावें सीधे गोमती में आती-जाती थीं।
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देहरादून भेजी जानी थी नाव
छतर मंजिल में उत्खनन में मिली नाव पर पुरातत्व विभाग की टीम को रिसर्च करना था। उसे फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट देहरादून भेजने की योजना थी, ताकि नाव के निर्माण का सटीक समय पता चल सके। इस रिसर्च में राष्ट्रीय सांस्कृतिक संपदा संरक्षण एवं अनुसंधानशाला के वैज्ञानिकों की भी मदद ली जानी थी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका।
पयर्टकों के लिए होनी थी डिस्प्ले
नाव को संरक्षित कर पर्यटकों के लिए डिस्प्ले किया जाना था, ताकि लखनऊ आने वाले पर्यटकों को यहां के स्वर्णिम इतिहास से रूबरू कराया जा सके। छतर मंजिल में ही नाव को डिस्प्ले करने की योजना थी। नाव व नवाबी काल के इतिहास को भी डिस्प्ले के साथ अंकित किया जाना था, लेकिन अब इस पर पानी फिर गया है।
जूट के बोरों से ढकनी थी नाव
नाव जब खुदाई में मिली तो नई दिल्ली से एनआरएलसी की टीम को बुलाया गया। टीम में शामिल आला अधिकारियों ने संरक्षण कार्य और खुदाई में मिली नाव का मुआयना भी किया था। अधिकारियों ने नाव को मौजूदा जगह से हटाकर अंदर रखने की सलाह दी थी, ताकि इसे मौसम की मार से बचाया जा सके। उन्होंने जूट के बोरों, मिट्टी और सिल्ट से नाव को ढकने की बात भी कही थी, लेकिन पुरातत्व विभाग ने नाव को पन्नी से ढककर वैसे ही दफना दिया है।
बजट मिले तो हो सकती है संरक्षित
छतर मंजिल में मिली नाव का जब एनआरएलसी की टीम ने निरीक्षण तो उसके रासायनिक संरक्षण पर 30 लाख रुपये का खर्च बताया था। पुरातत्व विभाग के पास इतना बजट न होने से संरक्षण का कार्य अटक गया और नाव को उसी जगह पर दफना दिया गया। यदि यह बजट मिल जाए तो नाव को दोबारा संरक्षित किया जा सकता है।
निदेशक, राज्य पुरातत्व विभाग डॉ. आनंद कुमार सिंह ने कहा कि छतर मंजिल परिसर में खुदाई के दौरान दो सौ साल पुरानी ऐतिहासिक नाव मिली थी। उसे वहीं दफना दिया गया है। जल्द ही एनआरएलसी की मदद से नाव के संरक्षण का कार्य शुरू करवाया जाएगा।
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