सूबे में एक वजीर हैं जो वजीर-ए-आला की भी नहीं सुनते। नीचे वालों की बिसात ही क्या।
वजीर की एक क्वालिटी है कि मन में जो आया, वह पूरा होना चाहिए।
काम चाहे जायज हो या नाजायज, उसे पूरा कराने के लिए दबाव बनाने लगते हैं।
कई अधिकारी अपनी कलम फंसाकर वजीर की इच्छा पूरी करने से कतराते हैं। ऐसे अधिकारियों को वजीर के साथ काम करने में अक्सर दिक्कत आती है।
इस कारण वे वजीर के साथ काम करने से कतराने लगते हैं। उनके विभाग के अब तक आधा दर्जन अधिकारी उन्हें छोड़कर जा चुके हैं।
अधिकारी वजीर से छुटकारा पाने के लिए सबसे पहले लंबी छुट्टी पर जाते हैं और बाद में विभाग बदलवाकर नई जगह जॉइन कर लेते हैं।
हाल ही में वजीर के विभाग के एक और महत्वपूर्ण अधिकारी उनसे आजिज आकर लंबी छुट्टी पर चले गए हैं। वे भी अपना विभाग बदलवाने की जुगत में लग गए हैं।