राजधानी में सोमवार को पार्टी के प्रदर्शनकारियों पर बर्बर लाठीचार्ज के विरोध में मंगलवार को विधानमंडल के दोनों सदनों में कांग्रेस के सदस्यों ने कार्यवाही नहीं चलने दी।
विधानसभा व विधान परिषद में प्रश्न प्रहर हंगामे की भेंट चढ़ गया। कांग्रेस सदस्य प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज की न्यायिक जांच कराने की मांग कर रहे थे जबकि संसदीय कार्य मंत्री मो. आजम का कहना था कि कोई विधायक नहीं पिटा।
पिटे वे लोग जो गुंडागर्दी कर रहे थे। कांग्रेस के सदस्य गलत आरोप लगा रहे हैं। कांग्रेस सदस्यों के वेल में प्रदर्शन, नारेबाजी और हंगामे के बीच दोनों सदनों में जैसे-तैसे आज का एजेंडा निपटाकर कार्यवाही बुधवार पूर्वाह्न 11 बजे तक के लिए स्थगित कर दी गई।
आज सुबह विधानसभा की कार्यवाही शुरू होते ही विरोध स्वरूप काली पट्टी बांधकर आए कांग्रेस के सदस्य हाथ में नारे लिखे पर्चे लिए वेल में उतर आए और कानून-व्यवस्था को लेकर सरकार के खिलाफ नारेबाजी करने लगे।
कांग्रेस विधानमंडल दल के नेता प्रदीप माथुर का कहना था कि पुलिस ने सोमवार को कांग्रेस के प्रदर्शनकारियों पर बर्बर लाठीचार्ज किया जिससे पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं और दर्जनों कार्यकर्ताओं को गंभीर चोटे आई हैं।
यही नहीं लगभग पांच हजार कांग्रेसी कार्यकर्ताओं पर संगीन धाराओं में मुकदमे दर्ज कराए गए हैं। उनका कहना था कि इसकी न्यायिक जांच कराई जाए तथा लाठीचार्ज कराने वाले पुलिस के अफसरों पर कार्रवाई की जाए।
अध्यक्ष माता प्रसाद पांडेय ने कांग्रेस सदस्यों से कहा कि सवेरे सभी लोग उनसे मिले थे। उन्होंने पूछा तो सभी ने कहा कि किसी को चोट नहीं लगी।
आजम ने सभी आरोपों को किया खारिज
कांग्रेसी विधायको के आरोपों का जवाब सरकार की ओर से आजम खां ने दिया। आजम ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि ये सभी विधायक भी प्रदर्शन में शामिल थे और इनमें न तो कोई पिटा और न किसी को चोट आई। पिटे वो लोग जिन्होंने गुंडागर्दी की होगी।
पुलिस पर पथराव किया या कानून-व्यवस्था बिगाड़ने की कोशिश की। बार-बार अनुरोध करने के बाद भी कांग्रेस के सदस्य वेल से नहीं हटे तो अध्यक्ष ने नेता प्रतिपक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य से उन्हें समझाने को कहा।
मौर्य खड़े होकर भाषण देने लगे तो अध्यक्ष ने उन्हें यह कहते हुए टोका कि उन्होंने समझाने को कहा है, बोलने को नहीं। मौर्य बैठ गए। इसके बाद अध्यक्ष ने 11.06 बजे सदन की कार्यवाही 10 मिनट के लिए स्थगित कर दी। फिर स्थगन 11.30 बजे तक बढ़ाया गया। बाद में स्थगन 12.20 बजे तक के बढ़ा दिया गया।
12.20 बजे कार्यवाही शुरू हुई तो कांग्रेस सदस्य वेल में ही नारेबाजी करते रहे। अध्यक्ष ने पूर्व सदस्यों के निधन की सूचना की बात कही तो कांग्रेस सदस्य अपनी सीटों पर लौट आए। पूर्व सदस्यों को श्रद्धांजलि देने के बाद फिर हंगामा शुरू हो गया तो अध्यक्ष ने 12.40 बजे कार्यवाही पहले 10 मिनट के लिए स्थगित की फिर स्थगन 1 बजे तक बढ़ा दिया।
1 बजे कार्यवाही शुरू होते ही अध्यक्ष एजेंडा निपटाना शुरू दिया। इस दौरान कांग्रेस सदस्यों ने पीठ की तरफ बढ़ने की कोशिश की लेकिन सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें रोक लिया। हंगामे और शोर-शराबे के बीच अध्यक्ष ने 40 मिनट के भीतर एजेंडा दिया।
अनुपूरक बजट पास कराकर 1.40 बजे सदन की कार्यवाही बुधवार 11 बजे तक के लिए स्थगित कर दी। अध्यक्ष ने सदस्यों से बुधवार को सदन चलने देने की अपील भी की।
विधान परिषद में भी हंगामा
विधानसभा की ही तरह परिषद में हंगामे की स्थिति बनी रही। विधान परिषद में पहले पूरा प्रश्नप्रहर स्थगित हुआ फिर शून्यप्रहर में जैसे ही सदन बैठा तो कांग्रेस के सदस्य फिर नारेबाजी करने लगे।
सभापति ने जैसे-तैसे एजेंडे की औपचारिक कार्यवाही निपटाकर सदन की कार्यवाही बुधवार को सुबह 11 बजे तक स्थगित कर दी। सभापति गणेश शंकर पाण्डेय ने सभी दलों के नेताओं को बुलाकर सदन चलाने का रास्ता निकालने का प्रयास किया।
विपक्ष की इस मुद्दे पर सरकार से पहले चर्चा की मांग और कांग्रेस की मांग के मुताबिक घटना की न्यायिक जांच की मांग को देखते हुए कोई समाधान नहीं निकल सका।
सदन की कार्यवाही शुरू होते ही कॉंग्रेस के नसीब पठान और दिनेश सिंह सरकार के खिलाफ नारे लिखी पट्टियां लेकर वेल में पहुंच गए और सरकार के खिलाफ नारेबाजी करने लगे। दोनों सदस्य सरकार पर धरना-प्रदर्शन के विपक्ष के लोकतांत्रिक अधिकार को तानाशाही तरीके से कुचलने का आरोप लगा रहे थे।
नेता प्रतिपक्ष नसीमुद्दीन सिद्दीकी, भाजपा के नेता हृदयनाराणयण दीक्षित, रालोद के नेता चौधरी मुश्ताक ने भी कांग्रेस की मांग का समर्थन किया। कहा कि लोकतंत्र में धरना-प्रदर्शन का भी यदि अधिकार नहीं मिलेगा तो क्या होगा।
इन्होंने यह भी कहा कि हद तो यह है कि पुलिस और अधिकारी अब शक्ति प्रदर्शन के दौरान जानबूझकर मर्यादा का उल्लंघन करते हैं और वरिष्ठ नेताओं के तक के साथ अभद्र व्यवहार करने लगे हैं। सदस्यों ने कहा कि सदन में कॉंग्रेस की संख्या कम होने का मतलब यह नहीं है कि उनकी बात ही न सुनी जाए।