अनंत विक्रम सिंह के रूप में अमेठी राजघराने के किसी व्यक्ति ने पहली बार कांग्रेस से इतर दूसरी पार्टी भाजपा का दामन नहीं थामा है। अनंत के बाबा राजा रणंजय सिंह भी जनसंघ के निशान पर विधायक रहे।
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उनके पिता राज्यसभा सदस्य डॉ. संजय सिंह तो कई बार राजनीतिक निष्ठाएं बदल चुके हैं। अब खुद अनंत ने भाजपा से राजनीतिक पारी खेलने का फैसला किया है। फर्क सिर्फ यह है कि पहली बार यह घराना दो विपरीत राजनीतिक धाराओं में बंटा है।
डॉ. सिंह की पहली पत्नी गरिमा सिंह के पुत्र अनंत विक्रम के भाजपा में जाने की मुख्य वजह राजघराने में छिड़ी विरासत की जंग मानी जा रही है। अनंत विक्रम कुछ महीने पहले अपनी मां व परिवार के अन्य सदस्यों के साथ अमेठी स्थित राजभवन पहुंचे थे।
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डॉ. संजय सिंह और उनकी दूसरी पत्नी अमिता सिंह ने इसका विरोध किया था। यह विवाद अभी चल रहा है। डॉ. सिंह कांग्रेस से राज्यसभा सदस्य हैं। माना जा रहा है कि अनंत विक्रम ने सियासी पारी में उनको जवाब देने के लिए भाजपा का दामन थामा है।
बदल सकती है अमेठी की सियासत
एक घराने से निकली दो राजनीतिक धाराएं अमेठी की सियासत को क्या मोड़ देंगी, यह तो आने वाला वक्त बताएगा, पर कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा ले रही भाजपा को इससे जरूर ताकत मिलेगी।
यह जुड़ाव भविष्य में कांग्रेस और राहुल गांधी के चुनावी समीकरण को भी प्रभावित करेगा। इसका असर संजय सिंह और अमिता सिंह के राजनीतिक भविष्य पर भी पड़ सकता है।
भाजपा के लिए काफी अहम है अमेठी अमेठी व रायबरेली भाजपा के लिए काफी अहम रहा है। भगवा टोली का काफी पहले से सपना रहा है कि नेहरू-गांधी परिवार के इस क्षेत्र में अजेय होने की धारणा लोगों के दिमाग से निकाली जाए।
चुनावी राजनीति में इस परिवार को कड़ी टक्कर दी जाए, पर अकेले दम पर उसका यह सपना अभी तक पूरा नहीं हो पाया। चूंकि कांग्रेस के आगे की राजनीति राहुल गांधी पर ही निर्भर है। इसीलिए भाजपा ने अमेठी पर खासा फोकस कर रखा है।
मनोहर पर्रिकर ने भी गोद लिया एक गांव
इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी से मात खाने के बावजूद स्मृति ईरानी को मानव संसाधन विकास जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय में कैबिनेट मंत्री बनाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेठी को महत्व देने का संदेश लोगों को दिया।
चुनाव हारने के बाद स्मृति अमेठी आईं तो उन्होंने यहां के लोगों की हमेशा सेवा करते रहने का वादा किया। यही नहीं, सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत भाजपा से राज्यसभा सदस्य व केंद्रीय रक्षामंत्री मनोहर परिकर ने यहां एक गांव गोद लिया है। भाजपा अमेठी की जनता को संदेश देना चाहती है कि उनकी चिंता सिर्फ नेहरू-गांधी परिवार को ही नहीं है।
कांग्रेस के अलावा जनसंघ से भी लड़े रणंजय सिंह अमेठी के बुजुर्ग कांग्रेसी नेता राममूर्ति शुक्ल के अनुसार, राजा रणंजय सिंह का सियासी सफर कांग्रेस से ही शुरू हुआ था। वे आजादी के पहले भी कांग्रेस से विधान परिषद के सदस्य रहे। वर्ष 1962 में वे तत्कालीन मुसाफिरखाना सीट से कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा सदस्य रहे।
बाद में गोरक्षा आंदोलन के दौरान 1969 में हुए चुनाव में वे जनसंघ के निशान पर अमेठी से प्रदेश विधानसभा के सदस्य चुने गए। हालांकि बाद में वे फिर कांग्रेस में लौट आए और दो बार कांग्रेस से विधानसभा के सदस्य रहे।
अनंत के पिता ने यूं बदले राजनीतिक दल
संजय गांधी की राजनीति में सक्रियता के साथ ही उनसे जुडे़ संजय सिंह वर्ष 1980 में कांग्रेस के टिकट पर अमेठी से विधायक हुए। उन्होंने 1985 का भी चुनाव जीता।
बोफोर्स तोप घोटाले के चलते कांग्रेस के विरोध में हवा चली तो संजय सिंह ने भी कांग्रेस छोड़ जनता दल का दामन थाम लिया। वर्ष 1989 के चुनाव में वे जनता दल से लड़े। उन पर हमला हुआ। वे चुनाव भी हार गए। बाद में वे तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के साथ चले गए और राज्यसभा सदस्य हुए।
उस सरकार में उन्हें दूरसंचार राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार बनाया गया। राज्यसभा का कार्यकाल खत्म होने को आया तो संजय ने अपने तार भाजपा से जोड़े। वर्ष 1998 में भाजपा के टिकट पर वे अमेठी से सांसद चुने गए। उन्होंने कैप्टन सतीश शर्मा को हराया।
1999 में सोनिया ने दी मात
वर्ष 1999 में वे सोनिया गांधी से चुनाव हार गए। संजय सिंह 2004 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस से लड़ना चाहते थे, पर टिकट नहीं मिल पाया। वे 2009 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस के टिकट पर सुल्तानपुर से लड़े और जीते।
2014 के चुनाव से पहले उनके फिर भाजपा में जाने की चर्चा शुरू हुई। एक-दो मौकों पर संजय सिंह के ऐसे बयान भी आए जिनसे लगा कि वे राहुल गांधी के लिए मुसीबत बन सकते हैं।
माना जाता है कि संजय सिंह के इसी दबाव के चलते कांग्रेस ने उन्हें असोम से राज्यसभा में भेजकर राहुल की जीत की संभावनाओं को मजूबत बनाने की कोशिश की। कांग्रेस को इसका लाभ भी मिला।
वर्ष 2002 के चुनाव में संजय सिंह ने अपनी दूसरी पत्नी अमिता सिंह को अमेठी से भाजपा के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ाया।
वे जीतीं और प्राविधिक शिक्षा राज्यमंत्री बनीं, पर 2003 में भाजपा व बसपा में अलगाव के चलते जैसे ही भाजपा सत्ता से हटी तो संजय सिंह फिर नया राजनीतिक ठौर तलाशने में जुट गए।
आखिरकार उन्हें कांग्रेस में ले लिया गया। अमिता ने भी भाजपा छोड़ दिया। वे कांग्रेस के टिकट पर अमेठी से विधानसभा का उपचुनाव लड़ीं और जीतीं।