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भई! रोजी-रोटी का सवाल है

Mon, 22 Jul 2013 11:08 AM IST
लखनऊ/इंटरनेट डेस्क
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पिछले कई साल से ‘गुम’ चल रहे एक नौकरशाह हाल ही में एकाएक अवतरित हुए।
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लोगों को उम्मीद थी कि, इतने साल तक ‘अज्ञातवास’ में रहने के बाद उनमें कुछ बदलाव तो आया ही होगा, लेकिन सामना हुआ तो जस के तस।

पहले भी दार्शनिक अंदाज में धर्म-कर्म की बातें करते थे और आज भी। मिलने पहुंचने वालों से विभागीय कामकाज पर चर्चा करने के बजाय उनकी ज्यादा दिलचस्पी मेडीटेशन वगैरह के फायदों पर बातचीत में रहती है।
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लोगों को इसके लिए प्रेरित भी कर रहे हैं। जिस महकमे की जिम्मेदारी सौंपी गई है वह काफी अहम है। किसी ने सवाल उठाया कि ऐसे में कब तक इस महकमे में रह पाएंगे? जवाब था, भई! इसी से रोजी-रोटी चल रही है।
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जितना बन पाएगा बेहतर से बेहतर करने की कोशिश करूंगा। फिर दार्शनिक अंदाज में बोले- मैं तो उड़ती चिड़िया हूं, कभी यहां तो कभी वहां। वक्त किसने देखा है।

अधीनस्थ लोग भी उनकी बातों का निहितार्थ तलाशने के लिए माथा-पच्ची कर रहे हैं, क्योंकि साहब का मूड समझे बगैर उनके साथ चल पाना मुश्किल होगा।
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