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जानें, उपचुनाव को लेकर क्या है अमित शाह का प्लान?

Wed, 20 Aug 2014 11:24 PM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
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भाजपा ने विधानसभा उपचुनाव के लिए प्रत्याशी चयन का काम शुरू कर दिया है। इसके लिए क्षेत्रों से दावेदारों के नाम मंगाकर सूची तैयार कर ली गई है।
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इस पर बुधवार रात वाराणसी में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी और महामंत्री संगठन सुनील बंसल के साथ प्रारंभिक विचार विमर्श किया।

एक-दो दिन में उम्मीदवारों के नाम घोषित हो जाने की उम्मीद है। बैठक में विधानसभा की 10 सीटों के लिए गंभीर उम्मीदवारों के नाम छांटे गए।
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इस तरह समीकरणों पर हो रही चर्चा

बैठक में अंतिम रूप से उम्मीदवारों के नाम तय करने के बजाय सामाजिक समीकरण के आधार पर मंथन किया गया। साथ ही विकल्पों पर भी बातचीत हुई।

उदाहरण के लिए यह विचार हुआ कि लखनऊ पूरब, नोएडा व निघासन में एक सीट पर ब्राह्मण, एक पर वैश्य या कुर्मी और एक पर ठाकुर को लड़ाया जाए।

हालांकि, सपा से कुर्मी उम्मीदवार होने के नाते निघासन से ज्यादा संभावना अन्य वर्ग से ही किसी को उतारने की है। लखनऊ में एक तरह से ब्राह्मण उम्मीदवार उतरना तय है।

ये होगी उम्मीदवारों की योग्यता

इसी तरह सहारनपुर में पंजाबी को उम्मीदवार बनाने पर सहमति बनी। बिजनौर सीट पर जाट तो हमीरपुर व चरखारी में से एक पर पिछड़े तो एक पर ब्राह्मण को लड़ाया जाएगा।

हमीरपुर से अति पिछड़ी जाति निषाद व चरखारी में ब्राह्मण को उम्मीदवार बनाने की ज्यादा संभावना है। ठाकुरद्वारा सीट से कोई क्षत्रिय ही चुनाव लड़ेगा।

सिराथू सीट से भी पिछड़ी जाति का ही कोई व्यक्ति लड़ेगा। भाजपा 10 सीटों पर ही चुनाव लड़ेगी। ग्यारहवीं सीट रोहनिया पर अपना दल का उम्मीदवार होगा। कैराना में अभी चुनाव नहीं हो रहा है।
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नहीं मिलेगी कठोर प्रभारी से मुक्ति

गौरतलब है कि भाजपा के नवनिर्वाचित राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह अभी यूपी के दौरे पर हैं। अभी कल मंगलवार को ही लखनऊ में भाजपा कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि 'जब तक यूपी में भाजपा का कोई नेता मुख्यमंत्री पद के रूप में शपथ नहीं ले लेता वह यूपी नहीं छोड़ेंगे।'

उन्होंने कार्यकर्ताओं का आह्रवान करते हुए कहा था कि हमारा असली काम तो अब शुरू होता है। यूपी में भाजपा की सरकार बनवानी है।

उन्होंने अपनी कार्यशैली में बदलाव की अटकलों को खारिज करते हुए यह भी कहा था कि कोई नेता यह न सोचें कि राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद उन्हें अमित शाह जैसे कठोर प्रभारी से मुक्ति मिल जाएगी।
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