भारतीय ओलंपिक एसोसिएशन (आईओए) की अध्यक्ष और देश की महानतम एथलीट पीटी ऊषा कहती हैं कि एक वक्त वह भी हुआ करता था, जब आईओए में अपनी बात रखने के लिए खिलाड़ियों के पसीने छूट जाते थे। वर्तमान में एसोसिएशन का स्वरूप ही बदल गया है। आज खिलाड़ी सीधे आकर मुझसे बात करते हैं और उनकी समस्याओं का समाधान तुरंत करने का प्रयास किया जाता है। शायद यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के प्रदर्शन में सुधार आया है। जहां तक इसी साल होने वाले पेरिस ओलंपिक का सवाल है, तो मुझे पूरा विश्वास है कि इस बार भारतीय दल की पदक संख्या में इजाफा होगा।
लॉस एंजिल्स में पदक से चूकने का आज भी मलाल
पीटी ऊषा कहती हैं कि मुझे लॉस एंजिल्स ओलंपिक (1984) की 400 मीटर बाधा दौड़ में कांस्य से चूकने का मलाल आज भी है। ओलंपिक दौड़ने से पहले महज तीन बार 400 मीटर बाधा दौड़ में हिस्सा लिया था। स्टार्ट खराब होने के कारण शुरुआती तीन बाधा के बाद मैं अन्य एथलीटों से काफी पिछड़ गई थी। चौथी बाधा को पार करने के बाद पूरा दम लगा दिया, लेकिन फिनिश लाइन पर अनुभव की कमी के चलते मामूली अंतर से कांस्य से चूक गई। आज भी उस दौड़ को याद करती हूं तो आंख में आंसू आ जाते हैं।
बदल चुका है खेल परिदृश्य
पीटी ऊषा ने कहा कि आज का खेल परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है। तब सुविधाओं के नाम पर कुछ भी नहीं था। बस तेज दौड़ना मेरी खासियत थी। शायद यही कारण रहा कि 16 साल की उम्र में देश के लिए पहली बार खेलने का मौका मिला। मौजूदा दौर में एथलीटों के उच्च स्तरीय ट्रेनिंग के अलावा विदेशी कोच तक उपलब्ध हैं। बेहतर सुविधाओं से परिणाम भी आना शुरू हो गए हैं।
स्कूल पर नहीं दे पा रही ध्यान
ओलंपिक में पदक से चूक जाने के कारण मैंने अपना ट्रेनिंग सेंटर बनाया। मेरी इच्छा है कि केरल के कोझिकोड में बने एथलेटिक्स स्कूल से कोई खिलाड़ी निकलकर ओलंपिक पदक जीते, तो लगेगा कि मैंने ओलंपिक पदक जीत लिया। आईओए में अध्यक्ष बनने के बाद अपने स्कूल के लिए समय नहीं निकाल पा रही हूं। कोशिश है कि कुछ समय स्कूल के लिए निकालकर फिर से ट्रेनिंग देना शुरू करूं ताकि ओलंपिक चैंपियन तैयार करने का सपना पूरा कर सकूं।