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अयोध्या ढांचा विध्वंस: साक्ष्य तो मिले पर नहीं बन सके सुबूत, सीबीआई ने की लचर विवेचना..., रह गए ये सवाल

Thu, 01 Oct 2020 12:57 PM IST
पंकज श्रीवास्‍तव नीरज श्रीवास्तव, अमर उजाला, लखनऊ
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फैसले के बाद मीडिया को जानकारी देते बचाव पक्ष के वकील - फोटो : अमर उजाला
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ढांचा ध्वंस मामले के आरोपियों को बरी करते हुए सीबीआई की विशेष अदालत ने माना कि अभियोजन ने कोई पुख्ता सुबूत कोर्ट में पेश नहीं किए। विशेष न्यायाधीश सुरेंद्र कुमार यादव ने आरोपियों को बरी करते हुए सीबीआई की लचर विवेचना और कमजोर साक्ष्यों को इंगित किया। 
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विशेष अदालत ने फैसले में सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट के कई निर्णयों का हवाला दिया और साक्ष्यों की समीक्षा भी की। कहा कि साक्ष्य से स्पष्ट है कि विवादित परिसर में लाखों कारसेवक मौजूद थे और नारे लगा रहे थे लेकिन आरोपियों के नारे की कोई रिकॉर्डिंग या आवाज का नमूना लेकर और मिलान करके कोर्ट में पेश नहीं किया गया। अभियोजन ने साक्ष्य के रूप में जो वीडियो कैसेट्स पेश किए, उनके जो दृश्य या भाषण आदि दिखाए गए हैं उनके साथ छेड़छाड़ की गई है। 

आरोपियों के भाषण के सुबूत नहीं: कोर्ट ने कहा कि 6 दिसंबर को किस आरोपी ने कौन-सा भाषण दिया, उसकी रिकॉर्डिंग न तो अभियोजन ने पेश की और न ही उसे साबित किया। जो वीडियो कैसेट्स पेश किए गए हैं उनसे संबंधित गवाहों ने खुद ही स्वीकार किया कि वे एडिटेड हैं। लिहाजा अभियोजन को पुष्ट करना होगा कि किसने कौन-सा भाषण दिया, जिससे दो समूहों के बीच सौहार्द बिगड़ा। 
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कोर्ट ने कहा कि आरोपियों ने उत्तेजनात्मक भाषण दिया, मात्र इसके आधार पर उनको दोषी नहीं ठहराया जा सकता। 6 दिसंबर तक अयोध्या में एलआईयू सक्रिय रही और उसने भी कोई ऐसी रिपोर्ट नहीं दी कि नारे लगाए जा रहे थे और जो नारे लगाए जा रहे थे उससे किसी धर्म-संप्रदाय या जाति की भावना आहत होती हो। 

किसके उकसावे पर ढांचा गिरा, नहीं हुआ सिद्ध

जिन गवाहों को प्रत्यक्षदर्शी बनाकर पेश किया गया, वे भी साबित नहीं कर पाए कि आरोपी कौन-सा नारा लगा रहे थे और उससे किस प्रकार से किसी की भावना आहत हुई। 
- अभियोजन के गवाह संख्या 229 ने कहा कि रामकथा कुंज की छत पर बने मंच पर वीएचपी, भाजपा, संघ, बजरंग दल और अन्य संगठनों के नेता, साधु-संत लाउडस्पीकर से मंदिर की साफ-सफाई के बारे में भाषण दे रहे थे जबकि मामले के मुख्य विवेचक ने कहा कि पूरी विवेचना में ऐसा कोई गवाह नहीं मिला जिसने ये कहा हो कि किसी के कहने या उकसाने पर ढांचा तोड़ा गया था। 

- वहीं एक गवाह मोहम्मद अली उर्फ खुरचन ने कहा कि उसके घर में रखी कुरान जल गई थी। उसने यह भी गवाही दी थी कि वह अपने घर से चला गया था और सात दिन बाद वापस आया तो कुरान जलने की बात पता चली। हालांकि उसने ये बात न तो अपनी एफआईआर में दर्ज कराई और न ही विवेचना के समय सीबीआई को बताई। इससे इस गवाह का बयान विश्वसनीय नहीं लगता है। 

आरोपियों ने नहीं किया किसी धर्म को आहत 
मामले की पहली रिपोर्ट दर्ज कराने वाले प्रियंवदानाथ शुक्ला ने भी बयान दिया कि आरोपियों ने मोहम्मद अली का घर नहीं जलाया था। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन साक्ष्य देखने से स्पष्ट है कि 6 दिसंबर को कारसेवकों का एक समूह अचानक अराजक हो गया जिसने धरना दिया लेकिन किसी आरोपी ने किसी अन्य धर्म को आहत करने का कोई कार्य नहीं किया था। 

मीरबाकी के शिलालेख को किसने तोड़ा, स्पष्ट नहीं 

कोर्ट ने कहा कि सीबीआई ने ढांचे पर लगे मीरबाकी के शिलालेख को आरोपी पवन पांडेय द्वारा अन्य लोगों के साथ मिलकर जीप में रखकर खिंचाई गई फोटो को सुबूत बनाकर पेश किया है। लेकिन मात्र एक फोटो साबित नहीं करती कि शिलालेख पवन ने तोड़ा और उसे अपने साथ उठा कर ले गए। सीबीआई वह शिलालेख बरामद नहीं कर पाई।  

आरोपियों ने भीड़ को रोकने का किया प्रयास 
कोर्ट ने कहा कि 6 दिसंबर को प्रतीकात्मक कारसेवा की अनुमति सुप्रीम कोर्ट ने दी थी। पर कारसेवकों की संख्या निर्धारित नहीं किया गया था। लाखों कारसेवकों को नियंत्रित करने के लिए मंच से अशोक सिंघल द्वारा लगातार निर्देश दिए जा रहे थे। लिहाजा इससे स्पष्ट है कि आरोपियों ने किसी लोकसेवक को उसके कर्तव्यों से नहीं रोका बल्कि आरोपी भीड़ को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहे थे। 

गवाहों ने दिए विरोधाभासी बयान 
कोर्ट ने गवाहों के विरोधाभासी बयानों को इंगित करते हुए कहा कि अभियोजन गवाह संख्या 166 ने कोर्ट में बताया कि 6 दिसंबर को घर से ही नहीं निकला जबकि अपने मुख्य बयान में उसने कहा कि ब्रजभूषण को भाषण देते सुना। गवाह के तौर पर कई पत्रकारों को सीबीआई ने पेश किया जिन्होंने सतीश प्रधान, पवन पांडेय के प्रेस काॅन्फ्रेंस में शामिल होना बताया लेकिन उन्होंने अपने बयान के समर्थन में प्रेस काॅन्फ्रेंस के दौरान लिखे गए नोटबुक को कोर्ट में पेश नहीं किया।  

पहचान वाली फोटो कोर्ट में नहीं हुई पेश 
गवाहों ने जिस फोटो के जरिये धर्मदास की पहचान करना बताया, उसको कोर्ट में पेश नहीं किया गया। एक गवाह ने बयान दिया कि वह दिल्ली में 1 दिसंबर, 1992 को जयभगवान गोयल की मीटिंग में शामिल था लेकिन कोर्ट में पूछताछ के समय उसे यह याद नहीं था कि मीटिंग किस जगह हुई थी।
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आश्चर्य : भला छह चादरों से कैसे ढांचे को पहुंचाया नुकसान 

विहिप नेता चंपत राय को मात्र इस आधार पर आरोपी बनाया गया था कि उन्होंने कारसेवा के लिए टेंट का सामान मंगाया था। कोर्ट ने कहा कि सीबीआई ने कहा था कि चंपत द्वारा रामकथा कुंज और रामजन्मभूमि न्यास के नाम से चादर आदि मंगाई गई थी। सीबीआई का कहना कि ये सामान विवादित ढांचे को क्षति पहुंचाने के लिए मंगाया गया था। कोर्ट ने आश्चर्य व्यक्त किया कि छह चादरों से कैसे विवादित ढांचे को नुकसान पहुंचाया जा सकता है। कोई सुबूत भी नहीं पेश किया गया जो यह साबित करता हो कि चादरों से ढांचे को क्षति पहुंचाई गई।

गवाह पत्रकार भी नहीं दे पाए साक्ष्य 
कोर्ट ने कहा कि जिन पत्रकारों ने इस मामले की रिपोर्टिंग की, उन्हें गवाह बनाया गया लेकिन किसी ने अपने मूल नोटबुक को  पेश नहीं किया। अगर मूल नोटबुक को पेश किया जाता तो वह महत्वपूर्ण साक्ष्य होते। कुछ गवाहों ने अपने नोटबुक की छायाप्रति तो पेश की लेकिन कोर्ट ने उसे साक्ष्य नहीं माना। वीडियो कैसेट्स पेश किए गए उसे किसने रिकॉर्ड किया, यह भी नहीं बताया गया जो उन साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं। इनकी जांच विधि विज्ञान प्रयोगशाला से नहीं कराई और कैसेट को सील करने का प्रमाण भी पेश नहीं किया।
 
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