यूपी का सबसे अहम और बड़ा सियासी मैदान सज चुका है। अब बारी है यहां जंग छिड़ने की। सभी सियासी योद्धा अपने हथियारों का शान दे रहे हैं। जानिए, किसके पास क्या हैं हथियार।
भाजपा के राजनाथ सिंह के आते ही यहां की सियासी चौसर पलट सी गई। सपा ने अपने वरिष्ठ नेता का टिकट काटकर युवा ब्राह्मण मंत्री को कमान सौंप दी, तो आम आदमी पार्टी ने भी जल्दबाजी में बॉलीवुड अभिनेता जावेद जाफरी को टिकट थमा दिया।
बसपा ने पहले ही नकुल दुबे को माया की कमान सौंप दी थी। इसी तरह, मुकाबले में सबसे कमजोर लगने वाली कांग्रेस भी रीता बहुगुणा जोशी पर दांव खेल रही है।
सियासी पंडित कुछ भी कहें, पर लखनऊ की जनता मानती है कि ये जंग दिलचस्प है। आगे पढ़िए, किसके जीतने के चांस हैं ज्यादा।
राजनाथ सिंह (भाजपा): संघ का पूरा आशीर्वाद
2009 में गाजियाबाद से सांसद, अटल व यूपी की कल्याण सरकार में मंत्री। 1977 में मिर्जापुर से पहली बार विधायक। वर्ष 2000 से 2002 तक प्रदेश के मुख्यमंत्री, दो बार हैदरगढ़ (बाराबंकी) से विधायक, तीन बार राज्यसभा सदस्य।
तरकश के तीर: राष्ट्रीय कद, संघ का पूरा आशीर्वाद, अटल की विरासत की ताकत, लोगों से सीधे संवाद की शैली। अटल व टंडन के अधूरे कामों को पूरा करने का वादा।
राजनाथ सियासत के महारथी माने जाते हैं। पार्टी किसी भी स्थिति में रहे, राजनाथ नेतृत्व में जरूर रहते हैं। यूपी में भले ही शाह आ जाएं, आखिरी दस्तखत राजनाथ के ही होते हैं।
लखनऊ का एक तबका मान रहा है कि राजनाथ इस जंग में सबको पछाड़ देंगे और इसमें मदद करेगी आप से जावेद जाफरी की उम्मीदवारी।
रीता बहुगुणा जोशी (कांग्रेस): मुसलमानों में गहरी पैठ
लखनऊ से विधायक। 2009 में भाजपा प्रत्याशी लालजी टंडन से कड़ा मुकाबला, लेकिन 38000 हजार वोटों से पराजित। इलाहाबाद की महापौर महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष रहीं। कांग्रेस की पूर्व प्रदेश अध्यक्ष।
तरकश के तीर : हेमवती नंदन बहुगुणा की पुत्री के नाते मुसलमानों में पैठ, ब्राह्मण मतदाताओं के बीच अच्छा दखल, सहजता से उपलब्ध। लखनऊ के चौतरफा विकास का वादा।
रीता बहुगुणा जोशी भी अपने पिता की तरह जुझारू नेता मानी जाती हैं। हालांकि, सूबे में कांग्रेस की बुरी स्थिति का खामियाजा जरूर उनके चुनावी रथ को प्रभावित कर सकता है।
हालांकि, इस बार लखनऊ के राजनीतिक पंडित मान रहे हैं कि राजनाथ को रीता से जबरदस्त टक्कर मिलने वाली है। और कहीं मतदाता इधर-उधर हुए, तो भाजपा का बेड़ा गर्क भी हो सकता है।
अभिषेक मिश्र (सपा): युवा नेता का दम
अखिलेश सरकार में मंत्री हैं। पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता व सांसद लालजी टंडन के पुत्र गोपाल टंडन को हराकर पहली बार विधायक बने।
तरकश के तीर: नया ब्राह्मण चेहरा होने के नाते राजधानी के युवा ब्राह्मणों के जुड़ने की संभावना, विधानसभा क्षेत्र में विकास कार्यों में दिलचस्पी।
अभिषेक मुख्यमंत्री के अच्छे मित्र माने जाते हैं और दिल खोलकर सुविधाएं मुहैया कराने में यकीन रखते हैं। पिछले दो बरस में अपने क्षेत्र में अच्छा काम करके लोगों के दिल मे जगह बना चुके हैं।
लखनऊ में चर्चा है कि अभिषेक ब्राह्मण वोटों में अच्छी सेंध लगा सकते हैं। इसके अलावा, अगर मुस्लिम वोट का भी साथ मिलता है, तो ये लखनऊ की लड़ाई को दिलचस्प बना सकते हैं।
नकुल दुबे (बसपा): ब्राह्मण मत के सेंधमार
एक बार विधायक, मायावती सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे, कई विभाग संभाले। विधानसभा का 2012 का चुनाव हार चुके हैं। पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं।
तरकश के तीर: राजधानी में लगभग एक लाख दलित वोटों की पूंजी। ब्राह्मण मतदातों में सेंधमारी का आशा। लखनऊ के विकास का आश्वासन।
नकुल मायावती के खासमखास लोगों में एक हैं। यही वजह है कि 2012 का चुनाव हारने के बावजूद उन्हें लोकसभा प्रत्याशी बनाया गया है।
नकुल ने अपने क्षेत्र में काम करना भी शु्रू कर दिया है। ये माना जा रहा है कि वे कुछ तो वोटबैंक काटने का काम करेंगे ही।
जावेद जाफरी (आप): काटेंगे मुस्लिम वोट?
मूलत: फिल्म अभिनेता हैं। टेलिविजन के जाने-माने कलाकार रहे हैं। उनका शो बूगी-वूगी युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय है। पहली बार राजनीति में आए हैं। पहली बार ही चुनाव लड़ रहे हैं। हालांकि वे आप के चुनाव प्रचार की तैयारी जरूर कर रहे थे।
तरकश में तीर : फिल्म से जुड़े होने व ‘आप’ से प्रत्याशी होने के नाते युवाओं को जोड़ने की उम्मीद। किसी अन्य दल से मुस्लिम चेहरा न होने के कारण राजधानी के लगभग 4.50 लाख मुस्लिम वोटों का बड़ा हिस्सा पाने की आशा।
अगर जावेद मुस्लिम वोट पर हाथ साफ करने में कामयाब होते हैं, तो ये भी अप्रत्याशित रूप से कड़ी टक्कर दे सकते हैं। हालांकि, अगर जावेद ने टक्कर दी तो राजनाथ की मुश्किल बढ़ सकती है।