राजधानी से लगे पड़ोसी जिले के एक पूर्व सांसद को पांच साल बाद अपने पाप का ख्याल आया।
उनका मन प्रायश्चित के लिए कुलबुलाया और बेचारे जा पहुंचे अकेले ही कचहरी। बिना वकील। गोया उनकी आत्मा चीख रही हो, ‘मैंने पांच साल पहले एक पार्टी की नेता का पुतला जलाया।
मेरे खिलाफ मामला भी दर्ज हुआ। पुलिस ने मुझे इतने साल न पूछा और न गिरफ्तार किया। उस अपराध की मुझे अब तक सजा नहीं मिली। मैं सजा भुगतने आया हूं।’ और वे जेल चले गए।
बेचारे पूर्व सांसद जी! उन्होंने तो पश्चाताप की आग को ठंडा करने के लिए जेल यात्रा का फैसला किया परंतु पार्टी के लोग हैं कि इस जेल यात्रा में भी उन्हें सियायी पेंच नजर आने लगा।
सवाल उठा रहे हैं कि यह प्रायश्चित नहीं बल्कि पार्लियामेंट का टिकट पाने की पालिटिक्स है।
वरना क्या कारण है कि जिस मुकदमे पर उस नेता ने सरकार में रहते सांसद जी को जेल भेजने की चिंता नहीं की, जिसका उन्होंने पुतला फूंका था।
अब जब उनकी पार्टी की ही सरकार सत्ता में है तो उन्हें कौन गिरफ्तार कर लेता? मामला कुल मिलाकर सहानुभूति हासिल कर अपना कटा टिकट वापस पाने की जुगाड़ का है।