उत्तराखंड वाले तिवारीजी अब सपाइयों को फूटी आंख नहीं सुहा रहे। नेताजी के अतिथि हैं, इसलिए कोई कुछ बोल भी नहीं पा रहा।
उनकी वजह से चुनाव में कितना फायदा होगा, यह तो चुनाव के बाद ही पता चलेगा, लेकिन अभी तिवारीजी गाहे-बगाहे कुछ न कुछ ऐसा कर बैठते हैं जिससे सपा नेताओं के लिए जवाब देना मुश्किल हो जाता है।
हाल ही में तिवारीजी फैजाबाद गए। एक मंत्री भी साथ थे। मीडिया से बातचीत शुरू हुई, तो वे नमो-नमो जपने लगे। तिवारीजी की इस फितरत से मंत्री महोदय को काटो तो खून नहीं।
बेचारे बगलें झांकने लगे। मामले की नजाकत समझते हुए तिवारीजी के मैनेजरों ने अगले दिन मीडिया को खंडन जारी किया कि उनका आशय कुछ और ही था।
इन मैनेजरों को कौन समझाए कि बात जुबान से और तीर कमान से निकलने के बाद वापस नहीं आता।
तिवारीजी को जो कहना था कह गए और समझने वाले समझ गए। पार्टी में ही खुसर-फुसर हो रही है कि तिवारीजी को नेताजी फायदे के लिए लाए थे, कहीं ऐसा न हो कि चुनाव में मेहमान ही परेशानी का सबब बन जाएं।