सरकार ने शासन के अफसरों को जिलों के भ्रमण और विकास कार्यों के सत्यापन की जिम्मेदारी सौंपी है।
उन्हें बारी-बारी से हर तहसील तक पहुंचना है। संयोग से कई अफसरों को अपने पुश्तैनी जिले की जिम्मेदारी मिल गई।
इनमें से कइयों को अपने जिले की माटी के लिए कुछ न कर पाने का मलाल रहा था। कलेक्टर और कमिश्नर बनकर अपने जिले के लिए जो नहीं कर पाए, अब चला-चली की बेला में इस जिम्मेदारी ने मौका दे दिया है।
ऐसे अफसरों ने अपने गृह तहसील से ही इस अभियान की शुरुआत की। अब वे बता रहे हैं कि जब गांव के मित्रों, शुभचिंतकों ने अखबारों में उनके आने की खबर पढ़ी तो कई लोग वहां मिलने पहुंच गए और कई ने मुआयने की खबर पढ़ने के बाद फोन किया।
यह अनुभव बहुत अच्छा लग रहा है। साहब ने भी अपने जिले के लिए जो भी अच्छा हो कराने का प्रयास शुरू कर दिया है।
बता रहे हैं कि जिले से आए कई प्रस्तावों को वह शासन स्तर पर अपने स्तर से भी पैरवी कर रहे हैं। शायद माटी के मोह से ही कुछ जिलों का भला हो जाए...।