मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने वित्त वर्ष 2014-15 के बजट से न सिर्फ लोकलुभावन घोषणाओं से पिंड छुड़ाकर अपनी बदली प्राथमिकताओं का संकेत किया बल्कि तुष्टीकरण के आरोपों से बिगड़ती सरकार की छवि भी बदलने की कोशिश की है।
‘हमारी बेटी-उसका कल’ व कब्रिस्तान की चारदीवारी निर्माण जैसी योजनाओं को लेकर जिस तरह के फैसले लिए, उससे यह साफ संदेश गया है।
विपक्ष भी सरकार की लैपटॉप, कन्या विद्याधन व बेरोजगारी भत्ता जैसी योजनाओं पर सीधा सवाल नहीं उठा पाता था, लेकिन लंबे समय तक इन्हें लागू रख पाने की मुश्किल के मद्देनजर ही वह इसे झुनझुना व भरमाने वाला कहकर आलोचना किया करता था।
विपक्ष ने इस योजना को तुष्टीकरण का नाम दिया
इसके पीछे वजह यह रहीं कि इन योजनाओं के लिए हर साल जिस भारी-भरकम रकम की जरूरत होती, सूबे के खजाने की माली हालत उसका भार वहन करने में सक्षम नहीं रह गई थी।
हालांकि जिस योजना ने सरकार की सबसे ज्यादा मुश्किलें बढ़ाईं, वह थी ‘हमारी बेटी-उसका कल’। यह योजना सिर्फ अल्पसंख्यक वर्ग की हाईस्कूल पास लड़कियों के लिए शुरू की गई थी।
ऐसा तब किया गया था जब इंटरमीडिएट पास सभी वर्ग की छात्राएं कन्या विद्याधन पहले से पा रही थीं। विपक्ष ने इसे मुस्लिम तुष्टीकरण के रूप में प्रचारित किया जिसका समाज में बड़ा असर सामने आया।
छवि बदलने की है कोशिश
यह जानने के बावजूद कि लोकसभा चुनाव में मुस्लिमों का बड़ा समर्थन सत्ताधारी दल को मिला है, सरकार ने इस स्कीम को आगे न बढ़ाने का साहस दिखाया।
सरकार की छवि बदलने की मुख्यमंत्री की कोशिश के रूप में इसे देखा जा रहा है। सिर्फ अल्पसंख्यक समुदाय के कब्रिस्तान व अंत्येष्टि स्थल की चारदीवारी निर्माण जैसी योजना को लेकर भी सरकार की खूब किरकिरी हुई थी।
सरकार इस योजना को समाप्त तो नहीं कर पाई लेकिन उसने ग्रामीण क्षेत्रों में अंत्येष्टि स्थल के विकास के लिए नई योजना का प्रस्ताव कर दूसरे वर्गों से भेदभाव के आरोपों से छुटकारा पाने का प्रयास किया है।
दलितों का भी विश्वास पाने का जतन
बसपा आरोप लगाती रही है कि सपा की सरकार में दलितों के लिए कोई स्थान नहीं है।
ऐसे में सरकार ने जूता बनाने वाले समुदाय के लिए दो विशेष योजनाओं के अंतर्गत धन का आवंटन कर दलितों को आकर्षित करने की कोशिश की है।
सरकार ने जूता गांठने वाले अनुसूचित जाति के कारीगरों को दुकान निर्माण के लिए 2.90 करोड़ रुपये और उन्हें दुकान के लिए नि:शुल्क जमीन उपलब्ध कराने की योजना शुरू की है।
इसके लिए 5.58 करोड़ का प्रावधान हुआ है। हालांकि इसे बड़ी रकम नहीं कह सकते पर यह संकेत जरूर है।
भेदभाव के आरोपों की गुंजाइश बरकार
सरकार ने उर्दू और अरबी भाषा को बढ़ावा देने के लिए जहां 556 करोड़ रुपये का आवंटन किया है, वहीं संस्कृत व अन्य भाषाओं पर एक तरह से चुप्पी ही साधे रही है।
अरबी-फारसी मदरसा आधुनिकीकरण योजना के लिए 240 करोड़ व अरबी पाठशालाओं के लिए 316 करोड़ का अनुदान प्रस्तावित है तो उर्दू माध्यम से प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी के लिए भी 1.50 करोड़ दिए गए।
अरबी-फारसी मदरसों के शिक्षकों के लिए राज्य अध्यापक पुरस्कार भी शुरू करने का ऐलान किया गया है।
इसके उलट संस्कृत भाषा को बढ़ावा देने के लिए ऐसा कोई प्रयास नजर नहीं आया। हां, भोजपुरी-अवधी, ब्रज व बुंदेलखंडी बोलियों के विकास के लिए जरूर 20 लाख रुपये देने का प्रस्ताव किया है।