- अनुसूचित जाति-जनजाति, पिछड़ों व अल्पसंख्यकों में व्यापक आधार
- 12 फीसदी जाटव, 9-10% यादव, 18 फीसदी मुसलमान कोर वोटर
- भाजपा विरोधी सेकुलर मतदाताओं के सामने गठबंधन मजबूत विकल्प
- पिछले लोस चुनाव में सपा-बसपा को 42.12 फीसदी वोट मिले जो भाजपा के 42.6% के लगभग बराबर
- 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा-बसपा को भाजपा और अपना दल से लगभग ढाई फीसदी ज्यादा वोट मिले।
- कांग्रेस से पि्रयंका के उतरने और गठबंधन की ओर से सवर्णों को टिकट मिलने से भाजपा के जातीय आधार में घुसपैठ की कोशिश
गठबंधन की चुनौतियां
- क्या ट्रांसफर होगा कोर वोट
- सपा-बसपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती कोर वोट एक-दूसरे को ट्रांसफर कराने की है। जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं में एका कायम करना आसान नहीं होगा। सीट बंटवारे के बाद दोनों दलों के स्थापित नेता अपनी सियासी पहचान बनाए रखने के लिए नया विकल्प चुन सकते हैं। पिछले ढाई दशकों में प्रदेश की राजनीति ने यादव बनाम दलित का रूप लिया है। ऐसे में क्या अखिलेश और माया के हाथ मिलाने से द्वंद्व एकदम समाप्त हो जाएगा?
- गैर यादव, गैर जाटव वोट
- गठबंधन का कोर वोट यादव, जाटव व मुस्लिमों को माना जाता है। इनकी लामबंदी से भाजपा के पक्ष में गैर यादव ओबीसी व गैर जाटव एससी वोटों का ध्रुवीकरण रोकना चुनौती होगी। पिछले लोकसभा चुनाव में गैर यादव पिछड़े और गैर जाटव दलित भाजपा की जीत का आधार बने थे। गठबंधन के सामने इनमें अपनी पैठ को और बढ़ाने की चुनौती है।
26 साल पहले राम लहर रोकने को मिले थे मुलायम-कांशीराम
मुलायम सिंह यादव ने 1992 में समाजवादी पार्टी बनाई। रामलहर के दौर में 1993 में हुए विधानसभा चुनाव में सपा-बसपा मिलकर चुनाव लड़े। तब सपा 256 और बसपा 164 सीटों पर चुनाव लड़ी थी।
मुलायम सिंह मुख्यमंत्री बने, हालांकि दो साल बाद बसपा ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया था।
- पूरे प्रदेश में भाजपा का मजबूत संगठन और बूथ तक नेटवर्क
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व सीएम योगी आदित्यनाथ जैसे चेहरों के साथ ही अमित शाह जैसे कुशल रणनीतिकार
- तीन महीने से एक के बाद एक कार्यक्रमों के जरिये जनता में पहुंच बनाना, कार्यकर्ताओं को काम का टारगेट देना
- सोशल इंजीनियरिंग से सभी वर्गों को साधने का अनुभव।
- गैर यादव ओबीसी व गैर जाटव अजा तक पहुंच बनाने की कोशिश, सवर्ण सहित परंपरागत वोटरों का भरोसा।
- केंद्र व प्रदेश की उपलब्धियां, सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और किसानों से जुड़ी योजनाएं, मोदी का खुद यूपी में सकि्रय रहना
उत्तर प्रदेश में गठबंधन के सामने भाजपा की चुनौतियां
आखिर कैसे बनेगा जातीय संतुलन : भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती जातीय संतुलन साधने की है। भाजपा का टारगेट नौ-दस फीसदी यादव और 12 फीसदी जाटवों के अलावा शेष हिंदू आबादी है। इनमें 20 प्रतिशत सवर्र्णों में भाजपा की पहुंच गहरी है, लेकिन गैर यादव ओबीसी और गैर जाटव एससी-एसटी आबादी तक पैठ को और मजबूत बनाना होगा।
भाजपा ने 2019 के लिए 50 फीसदी से ज्यादा वोट जुटाने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए परंपरागत सवर्ण वर्ग में जनाधार कायम रखते हुए गैर-यादव ओबीसी व गैर-जाटव एससी-एसटी को साधना होगा। यह चुनौतीपूर्ण है क्योंकि इन वर्गों को शासन-प्रशासन में सवर्ण वर्ग के दबदबे और अपनी उपेक्षा की शिकायत रहती है।
सरकार होने की जवाबदेही भी चुनौती
भाजपा पांच साल से केंद्र और दो साल से यूपी में सरकार चला रही है। कहीं, सरकार तो कई जगह सांसदों, विधायकों से नाराजगी है। राम मंदिर, कश्मीर, बेरोजगारी और किसानों के मुद्दों पर भी कुछ लोग सरकार के कामकाज से खुश नहीं है। ऐसे में सत्ता विरोधी रुझान से निपटना भी भाजपा के लिए चुनौती है।