कवाल में तिहरा हत्याकांड हुआ तो चौधरी साहब और उनके दल के लोग इस खुशफहमी
में घटनाक्रम से दूरी बनाए रहे हैं कि मृतकों में एक मुस्लिम और दो जाट
हैं।
क्यों किसी को नाराज किया जाए? वोट जाटों के भी चाहिए थे, मुस्लिमों
के भी। समीकरण पुराना है।
अंदाजा नहीं था कि हालात इतने बिगड़ जाएंगे।
सदियों से एकजुट भाईचारा बिखर जाएगा, गांवों में खून-खराबा और बड़े पैमाने
पर पलायन हो जाएगा।
अब चौधरी साहब के सांसद बेटे दिन निकलते ही चुपचाप
गांवों में पहुंचकर दोनों पक्षों के पीड़ितों से मिल रहे हैं लेकिन जख्म
बहुत गहरे हो गए हैं। जिस गणित में शुरू में पूरे मामले से दूरी बनाई, वह
अब भारी पड़ती दिख रही है।
हालात-‘न खुदा ही मिला न विसाले सनम’ वाली होती
जा रही है। न जाट खुश और न ही मुसलमान। देखना है कि गंगा-यमुना के दोआब में
गिरते जलस्तर के बीच हैंडपंप से पानी कैसे निकलेगा?