लोकसभा चुनावों में मिली करारी हार के बाद जिस तरह सीएम अखिलेश यादव ने 36 दर्जा प्राप्त मंत्रियों पर गाज गिराया, उससे यह साफ हो गया कि वह बर्खास्त हुए मंत्रियों की कार्यप्रणाली से खुश नहीं थे।
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लेकिन अखिलेश के पास 56 पोर्टफोलियो की जिम्मेदारी थी, बावजूद इसके यहां भी बेहतर कार्य नहीं हुआ और भाजपा ने इसका फायदा उठाने में देरी नहीं की।
इस तरह देखा जाए तो खुद सीएम भी सपा की हार के कम जिम्मेदार नहीं हैं।
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वित्त विभाग पर बढ़ता ही गया कर्ज
एक अंग्रेजी अखबार के मुताबिक सीएम अखिलेश यादव के पास 56 पोर्टफोलियो थे, लेकिन विकास के नाम पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ जिससे मोदी की लहर को कम किया जा सके।
सीएम के पास बिजली, वित्त, गृह, उद्योग, इंफ्रास्ट्रक्चर, वन, उच्च शिक्षा समेत और भी कई अहम जिम्मेदारियां थीं। अगर शुरूआत वित्त विभाग से करें, तो इस विभाग पर कर्ज का बोझ बढ़ता ही गया।
मार्च 2012 में यह कर्ज 2.09 लाख था, वहीं मार्च 2013 में यह बढ़कर 2.19 लाख करोड़ हो गया। इतना ही नहीं, यह बोझ 31 मार्च 2014 तक 2.39 लाख करोड़ के आस-पास अनुमानित रहा।
अखिलेश ने वित्त वर्ष 2014-15 का बजट पेश नहीं किया, हालांकि अब जून में आने वाले विधानसभा सत्र में इसे पेश किया जा सकता है।
रही-सही कसर मुजफ्फरनगर दंगे ने पूरी की
अखिलेश के पास गृह विभाग की भी जिम्मेदारी थी लेकिन वह प्रदेश में सुरक्षित महौल और सौहार्दपूर्ण वातावरण देने में पूरी तरह नाकाम रहे, जिसका नरेंद्र मोदी ने भरपूर फायदा उठा लिया।
अखिलेश के शासन काल में राज्य के अलग-अलग हिस्सों में 100 से भी ज्यादा सांप्रदायिक दंगे हुए। देखा जाए तो प्रदेश की पिछली सरकार में सांप्रदायिक दंगे ना के बराबर हुए।
इसके अलावा, नवंबर 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों ने सपा सरकार की रही-सही कसर भी पूरी कर दी, जिसका लाभ भारतीय जनता पार्टी को मिला।
इस दौरान एसटीएफ, एटीएस और एसआईटी जैसी विशेष सुरक्षा एजेंसियों ने भी बेहतर परफॉर्म नहीं किया, जिससे कहीं न कहीं सपा सरकार को थोड़ा-बहुत सहारा मिल गया होता।