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मुस्लिम और जाटों को मनाने में जुटा रालोद

Wed, 09 Oct 2013 12:22 PM IST
राजेन्द्र सिंह /लखनऊ
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मुजफ्फरनगर-शामली की हिंसा ने लोकसभा चुनाव से पहले राष्ट्रीय लोकदल की राह में रोड़े बिछा दिए।
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फिलहाल जो माहौल है, उसमें जाट रालोद से नाराज हैं और मुस्लिमों ने भी उससे दूरी बना रखी है। रालोद महासचिव जयंत चौधरी ने गांव-गांव जाकर लोगों का गुस्सा कम करने की कोशिश की।

इसका असर नहीं हुआ तो रालोद मुखिया अजित सिंह मंगलवार को मुजफ्फरनगर पहुंच गए, पर नाराज जाट अपनी बात सुनाए बगैर उन्हें सुनने को तैयार नहीं थे।

पश्चिमी यूपी के कुछ जिलों में रालोद का राजनीतिक आधार है। रालोद जाट-मुसलमान और अन्य किसान जातियों का समीकरण बनाने में जुटा हुआ था। यह समीकरण चौधरी चरण सिंह ने राजनीतिक प्रयोगशाला में टेस्ट करके बनाया था।
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मुजफ्फरनगर हिंसा में एक ही झटके में यह समीकरण तार-तार हो गया। पश्चिमी यूपी में सदियों पुराना भाईचारा टूटा और पहली बार जाट- मुसलमान आमने-सामने आ गए।

बिगड़ सकता है चुनावी गणित
इसी के साथ रालोद का चुनावी गणित भी बिखरता नजर आ रहा है। मुजफ्फरनगर-शामली में जो कुछ हुआ, उसमें रालोद के स्थानीय जाट और मुसलमान नेता हाशिये पर चले गए। न वे कुछ कहने की स्थिति में रहे और न ही दूसरे लोग सुनने की।
दरअसल 27 अगस्त को जब कवाल में एक मुसलमान और दो जाट युवाओं की हत्या हुई, उस समय रालोद साफ स्टैंड नहीं ले पाया।

रालोद के प्रमुख नेताओं ने घटना को आपराधिक मानकर कवाल और मलिकपुरा जाने से परहेज बरतने की कोशिश की। क्षेत्र के रालोद सांसद संजय चौहान तक वहां नहीं गए।

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शायद रालोद को लग रहा था कि विवाद जाटों और मुसलमानों के बीच है। इसलिए किसी एक पक्ष के साथ खड़ा नहीं हुआ जा सकता। 27 से 30 अगस्त तक रालोद के अनिर्णय जैसी स्थिति में रहने का संदेश गया।

सपा और भाजपा नेताओं ने इन स्थितियों का पूरा फायदा उठाया। 31 अगस्त की पंचायत में रालोद नेताओं ने जाने की कोशिश की तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद स्थिति उनके हाथ से लगभग निकल ही गई।
जाट और मुस्लिम दोनों हैं नाराज
मुजफ्फरनगर हिंसा के बाद सर्वाधिक घाटे में रालोद को माना जा रहा है। उससे जाट भी नाराज हैं और मुसलमान भी। जाट बिरादरी में रोष इसलिए है कि मुसीबत के समय जयंत चौधरी या अजित सिंह उनके बीच नहीं आए। शुरुआत में ही वे आ गए होते तो शायद हिंसा से बचा जा सकता था।
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प्रशासन की एकतरफा कार्रवाई रुक सकती थी या दोनों पक्षों के बीच संवाद से सुलह का रास्ता निकल सकता था। वहीं, मुसलमानों की नाराजगी इसलिए है कि उन्हें सर्वाधिक नुकसान जाटों के गांवों में पहुंचाया गया और जाट बिरादरी रालोद समर्थक मानी जाती रही है।

रालोद सुप्रीमो ने संभाली कमान सात और आठ सितंबर की हिंसा से बुरी तरह झुलसे रालोद के डैमेज कंट्रोल की शुरुआत जयंत चौधरी ने की। पाबंदी के बावजूद सवेरे पांच-छह बजे वे कई गांवों में पहुंचे।
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जयंत की कोशिशों के बावजूद लोगों का गुस्सा कम न होने पर अब चौधरी अजित सिंह आगे आए हैं। मंगलवार को वे पहली बार मुजफ्फरनगर पहुंचे।

हालांकि उनसे मिलने कई खाप चौधरी आए फिर भी उन्हें लोगों के विरोध का सामना करना पड़ा। टोका-टाकी के बीच उन्होंने यह समझाने की कोशिश की कि यहां सपा-भाजपा प्रायोजित राजनीतिक दंगा हुआ है।

उन्होंने मुसलमानों के साथ रालोद के तीन पीढ़ियों के रिश्तों का हवाला भी दिया।

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