लखनऊ। अब वसीयत सिर्फ कागज पर लिखे शब्दों तक सीमित नहीं रहेगी। उसमें दर्ज इच्छा की सुरक्षा और सत्यापन भी तकनीक के जरिये किया जा सकेगा। यही नहीं, वसीयत में एक अक्षर बदला तो एआई इसे पकड़ लेगा। लखनऊ विश्वविद्यालय के विधि संकाय के प्रोफेसर राकेश कुमार सिंह, शोधार्थी वरालिका निगम और उच्च न्यायालय के अधिवक्ता सारांश चतुर्वेदी की टीम ने डिजिटल वसीयत की सुरक्षा और सत्यापन से जुड़ी तकनीक विकसित की है। भारत सरकार ने इसे गत 21 सितंबर को भारतीय पेटेंट संख्या 603300 प्रदान किया है। इसके लिए मार्च 2025 में आवेदन किया गया था।
प्रोफेसर राकेश कुमार सिंह ने बताया कि इस प्रणाली में वसीयतकर्ता लिखित दस्तावेज के साथ आवाज और वीडियो के माध्यम से भी अपनी इच्छा दर्ज कर सकेगा। तकनीक में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), ब्लॉकचेन, क्रिप्टोग्राफिक हैश और बायोमेट्रिक सत्यापन का इस्तेमाल किया गया है। वसीयत को अंतिम रूप देने के बाद उसका क्रिप्टोग्राफिक हैश तैयार कर टाइमस्टैंप के साथ ब्लॉकचेन पर दर्ज किया जाएगा। बाद में दस्तावेज में एक अक्षर का भी बदलाव होने पर हैश बदल जाएगा और छेड़छाड़ का पता लगाया जा सकेगा।
एआई आधारित तंत्र दस्तावेज की भाषा में अस्पष्टता, विरोधाभास और अधूरे विवरण की पहचान करने के साथ संबंधित कानूनी प्रावधानों से उसका मिलान करेगा। चेहरे की पहचान, आवाज के विश्लेषण, फिंगरप्रिंट तथा टाइपिंग और माउस संचालन जैसे व्यवहारिक पैटर्न के जरिये यह जांचने का प्रयास किया जाएगा कि वसीयतकर्ता स्वतंत्र रूप से दस्तावेज तैयार कर रहा है या नहीं।
पेटेंट की गई प्रणाली में वसीयत को सिर्फ डिजिटल रूप में सुरक्षित रखने के बजाय उसकी तैयारी, सत्यापन, सुरक्षित भंडारण और मृत्यु के बाद निष्पादन तक की प्रक्रिया को तकनीक से जोड़ने की परिकल्पना की गई है। मृत्यु की आधिकारिक पुष्टि के बाद वसीयत से संबंधित प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की व्यवस्था भी प्रस्तावित है।
पेटेंट मिला, कानूनी वैधता का पेच बाकी
विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार, पेटेंट तकनीकी आविष्कार को मान्यता देता है। हालांकि, डिजिटल वसीयत की कानूनी वैधता अलग विषय है। भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम और संबंधित व्यक्तिगत कानूनों के तहत इसकी स्वीकार्यता का निर्धारण भविष्य में न्यायिक और नीतिगत स्तर पर होना होगा।