देश का कोई गैर मुस्लिम नागरिक अगर पहले से शादीशुदा है और यह बात छिपाकर दूसरी शादी करता है तो दूसरी पत्नी धोखा देने के आरोप में उसे 10 वर्ष जेल की सजा दिलवा सकती है, लेकिन मुस्लिम पुरुष अगर ऐसा करे तो धोखा खाई महिला उसके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं कर सकती।
यह मुद्दा उठाते हुए राजधानी के एक अधिवक्ता डॉ. सैयद रिजवान अहमद ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में याचिका दायर की है।
याचिकाकर्ता ने इसी विषय पर तीन महीने पहले अपनी पीएचडी पूरी की है। डॉ. अहमद ने याचिका में कहा है कि 1955 हिंदू मैरिज एक्ट बनने से हिंदू महिलाओं को इस तरह के अन्याय से बचने का रास्ता मिल गया। आईपीसी की धारा 494 कहती है कि अगर कोई व्यक्ति एक से अधिक विवाह करता है तो दूसरा विवाह शून्य होता है।
वहीं अगर उस आदमी की पहली पत्नी उसके साथ है, तो जिस महिला से दूसरी शादी की गई, वह आदमी पर केस कर उसे सात साल की जेल की सजा दिलवा सकती है।
वहीं आईपीसी की धारा 495 कहती है कि अगर कोई व्यक्ति आईपीसी 494 में दिया हुआ अपराध करता है और साथ-साथ होने वाली पत्नी से अपना पूर्व का विवाह छिपाता है तो नई पत्नी (जिसे अपनी वैवाहिक पृष्ठभूमि के बारे में व्यक्ति ने गुमराह रखा) चाहे तो एफआईआर करवाके आदमी को 10 साल की जेल करवा सकती है।
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के हैं अलग कानून
कोर्ट
- फोटो : डेमो फोटो
ये प्रावधान हिंदू, सिख और बौद्ध समुदाय की महिलाओं को राहत देते हैं। दूसरी ओर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड चूंकि अलग कानून रखता है, यहां मुस्लिम पुरुष द्वारा दूसरा, तीसरा या चौथा विवाह करने को जायज माना जाता है लेकिन अगर आदमी पहले से शादीशुदा है और वह होने वाली पत्नी से यह जानकारी छिपा कर उससे निकाह कर लेता है तो पत्नी को क्या करना चाहिए?
डॉ. अहमद ने कहा कि चूंकि मुस्लिम पुरुष पर आईपीसी की धारा 494 लागू नहीं होती, ऐसे में वह कह सकता है कि उसने कोई अपराध नहीं किया, तो सजा किस बात की। लेकिन इसका परिणाम औरत को भुगतना होता है। उन्होंने याचिका में कहा कि अगर मुस्लिम महिला को निकाह के बाद पता चले कि उसका शौहर पहले से शादीशुदा है, उसके बच्चे हैं तो वह क्या करे? तलाक देने भर से क्या उसके साथ हुए धोखे की भरपाई हो सकती है?
याची ने हाईकोर्ट से प्रार्थना की है कि मुस्लिम महिलाओं को इन परिस्थितियों से बचाने के लिए मुस्लिम पुरुषो को निकाह से पहले हलफनामा देकर अपनी वैवाहिक पृष्ठभूमि बताने का नियम बनाया जाए। या फिर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इसका कोई समाधान निकाले।
याचिका में केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलात मंत्रालय को प्रतिवादी बनाया गया है। केंद्र सरकार की ओर से बताया गया कि इसी से संबंधित एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर है।
इस पर जस्टिस श्रीनारायण शुक्ला और जस्टिस अनंत कुमार ने अपने निर्णय में मामले की सुनवाई के लिए छह अक्तूबर की तारीख तय की है। वहीं याची को पूर्व में दायर याचिका उपलब्ध करवाने के लिए कहा है।